रायपुर - श्री विमलनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट भैरव सोसाइटी में चल रहे आत्महित वर्षावास के अंतर्गत आयोजित प्रवचनमाला में पूज्य कंचन तिलक विजय जी महाराज समरादित्य महाकथा पर प्रवचन कर रहे हैं। इस कथा में अग्निशर्मा एवं गुणसेन नामक दो चरित्र हैं, इसकी व्याख्या करते हुए पूज्य श्री ने बतलाया कि राजा पूर्णसेन के पुत्र का नाम गुणसेन तथा राजपुरोहित के पुत्र अग्निशर्मा थे, जन्म से जहाँ गुणसेन रूपवान थे वहीं अग्निशर्मा कुरूप थे। वो एक बार राजकुमार की दृष्टि अग्निशर्मा पर पड़ी और उनके कुरूपता को देखकर उन्होंने उनका उपहास किया, उन्हें विविध प्रकार से प्रताड़ित कर गुणसेन अत्यंत आनंदित हुए, और फिर यह रोज का क्रम बन गया। अग्निशर्मा के पिता पाठक, एवं धर्म कुशल व्यक्ति थे, उनसे प्राप्त संस्कारों के कारण अग्निशर्मा इन सारी परिस्थितियों में भी गुणसेन के प्रति द्वेष नहीं रखता, वह अपने दुःख के लिए गुणसेन को नहीं बल्कि अपने पूर्व में किए हुए कर्मों को दोषी मानता है, वह इस परिस्थिति को पाप का उदय मानता पर, पूज्य श्री ने सभा से पूछा कि हम क्या मानते हैं? हमें कौन दोषी लगता है? हम अपने दुःख के लिए किसे ज़िम्मेदार ठहराते हैं? व्यक्ति को या परिस्थिति।