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आत्महित वर्षवास के अंतर्गत चल रही “कषायों की व्यथा - समरादित्य कथा” विषय पर प्रवचन माला।

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रायपुर - परम पूज्य आचार्य भगवंत श्रीमद् विजय योगतिलक सूरीश्वरजी महाराज के सूशिष्य पूज्य मुनिराज श्री श्वेततिलक विजयजी आदि ठाणा श्री विमलनाथ जैन मंदिर ट्रस्ट में चातुर्मासिक मिश्रा प्रदान कर रहे पाप।

आत्महित वर्षवास के अंतर्गत चल रही “कषायों की व्यथा - समरादित्य कथा” विषय पर प्रवचन माला चल रही कि, इसके अंतर्गत गुणसेन एवं अग्निशर्मा चरित्र का वर्णन करते हुए पूज्य श्री ने बतलाया की अग्निशर्मा राजपुरोहित का पुत्र कि, कर्मों के उदय के कारण उसे कुरूप शरीर प्राप्त हुआ कि, पर पिता माता पिता के द्वारा प्राप्त संस्कारों से वह यह मानता है कि उसे होने वाले दुखों का कारण कोई व्यक्ति नहीं, परिस्थिति नहीं बल्कि पूर्व में किए हुए कर्म पाप, पाप का उदय होने से ऐसी परिस्थिति बन रही कि। वर्तमान समय में हम अपने बच्चों को क्या संस्कार दे रहे हैं? क्या हमें पुण्य पाप कर्म आदि पर विश्वास है?

आज हम सब भौतिकता की ओर बढ़ रहे पाप, जीवन का केंद्र पैसा, सुख, सुविधा, सामग्री, हो गया कि। भोगों के इस युग में संस्कारों को बचाना अत्यंत आवश्यक कि, इसके लिए माता पिता की भूमिका महत्वपूर्ण कि।

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