पंडरिया - पंडरिया नगर के जैन समाज का वो गौरव कहे या वो चेहरा जिनका नाम लेते ही उनका जीवन व जिनशासन के प्रति समर्पण याद आने लगता है, ऐसे श्रेष्ठीवर्य शासन रत्न "स्व.श्री गौतमचंदजी लोढा" का जन्म 30 जून 1957 को पंडरिया में श्री फुलचंदजी लोढा के द्वितीय पुत्र के रूप में हुआ।
आप शुरु से ही सरल संयमित जीवन शैली मे विश्वास रखते थे। सफल व्यवसायी के साथ साथ राजनिति के क्षेत्र मे आपकी पकड़ भी मजबूत थी। साथ ही सामाजिक कार्यो में आप नि:स्वार्थ भाव से सतत् भूमिका रखने वाले व्यक्तित्व के धनी थे।
आपके प्रयासो से ही पण्डरिया में "श्री बकेला चिन्तामणि पार्श्वनाथ भगवान" के जन्म दिवस पर "पौष बदी दसमी" के भव्य मेले का आयोजन होना प्रारम्भ हुआ जो आज भी लोगो के हृदय मे जीवन्त है।
साथ ही बकेला एक विशाल तीर्थ बने यह सकल जैन समाज व गुरु भगवन्तो के आशिष के साथ आप का ही एक महान स्वप्न था, जिसके लिये आप तन-मन-धन अर्पण कर अहो भावो के साथ बकेला तीर्थ के उद्धार कार्यो मे निरन्तर लगे रहे।
बकेला तीर्थ में जहा एक ऐसा समय था, की लोगो का वहा पैदल भी पहुंच पाना भी आसान नही होता था, ऐसे तीर्थ के निर्माण का प्रथम प्रयास करने वाले श्री गौतमचन्दजी ने स्वयं के खर्चे पर जमीन खरीदी एवं निर्माण आरम्भ कराकर तीर्थ निर्माण की ओर पहला कदम बढ़ाया व राजनेताओ की मदद से बकेला तक सड़क निर्माण का कार्य भी करवाया।
आपके निस्वार्थ प्रयासों का ही परिणाम - श्री बकेला चिन्तामणी पार्श्वनाथ तीर्थ आपके कार्यो का मौन गवाह बना हुआ है।
सामाजिक कार्य के अलावा नगर के प्रसिद्ध विद्यालय सरस्वती शिशु मंदिर के अध्यक्ष पद पर रहते हुवे आपके कार्यकाल में कराये गए निर्माण कार्यो को पण्डरिया नगर में आज भी याद किया जाता है।
आपके जीवन काल में समाज के योगदान में मुख्य बाते ये रही की पंडरिया का जैन समाज कभी भी बिखराव की स्थिति में नहीं आया, आपने पण्डरिया जैन समाज के अध्यक्ष होने के नाते आपने सामाजिक सामंजस्व सदैव बनाये रखा। साथ ही पण्डरिया जैनमंदिर के बाजू में ख़ाली पड़ी जनपद पंचायत की जमीन को जैन समाज को दिलाने में आपकी भूमिका महत्वपूर्ण रही। जहां पर आज जैन भवन का निर्माण हो चुका है।
21 अक्टूबर 2007 को 48 वर्ष की अल्पायु में ही एक संघर्षमय जीवन जीते हुवे स्व. श्री गौतमचंदजी लोढ़ा का स्वर्गवास हो गया।
श्री बकेला तीर्थ के लिये सतत् परिश्रम करने वाले स्व. श्री गौतमचन्द लोढा जी का नाम व कार्य जानबुझ कर बकेला तीर्थ से विस्मृत किया जाता रहा है, जो की सकल जैन समाज के लिये दुर्भाग्यपूर्ण है व विचारणीय विषय भी है।
ऐसे महान युग पुरुष को
शत् शत् नमन्