रायपुर - धर्मसभा में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि जी महाराज साहब ने कहा कि अंधेरे ही सही थे जो राह पर ले आए। उजालों ने मुझे मंजिल से दूर कर दिया। मरीचि अंतिम पलों में इन्हीं शब्दों के साथ विदा हुआ। महिसार का जीवन अंधेरे में शुरू हुआ था। उजालों में खत्म हुआ। मरीचि का जीवन उजाले में शुरू हुआ। उजाले में जिया। एक छोटी सी भूल कर ली। जैसा धर्म प्रभु के संघ में है, वैसा ही धर्म मेरे पास है। प्रभु के धर्म को लेकर एक असत्य बोला गया है। असत्य जब भी बोला जाता है, वह सत्य से वंचित हो जाता है। प्रभु को लेकर कोई असत्य बोल दे तो वह प्रभु से वंचित हो जाता है। धर्मों को लेकर असत्य बोल दे तो धर्म से वंचित हो जाते हैं। प्रभु को खोने की पीड़ा वही समझ सकता है जिसने धर्म की अनुभूति की है। इस पीड़ा को वही महसूस कर सकता है जिसने कभी प्रभु को अपने साथ होने का अनुभव किया हो। मिथ्यात्मी जीव 2 प्रकार के होते हैं। एक वो जिसने कभी प्रभु को महसूस ही नहीं किया। जिसने कभी धर्म नहीं किया। दूसरा जिसने धर्म का पालन किया। प्रभु के संग जी लिया। फिर अपनी गलती से मिथ्यात्म में चला गया। पीड़ा किसे अधिक होगी? जिसने प्रभु को पाकर खोया उसे अधिक पीड़ा होगी या जिसने प्रभु को पाया ही नहीं, उसे अधिक पीड़ा होगी! पाकर खोने के बाद जो पीड़ा होती है, उसी वजह से प्रभु फिर मिलते हैं। पीड़ा न हो तो प्रभु के फिर मिलने की संभावना भी खत्म हो जाती है। पीड़ा गहरी होती है।