रायपुर - धर्मसभा में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि जी महाराज साहब ने कहा मनुष्य गति में कर्म भूमि ऐसा क्षेत्र है जो धर्म भूमि भी बन सकती है और अधर्म भूमि भी। बीज तभी अच्छे से पनप सकता है जब उसे जमीन, खाद और पानी अच्छी तरह मिल जाए। नरक गति हो या देवगति, इसमें जाने वाला व्यक्ति एक स्पेशल बीज लेकर जाता है। लेकिन, मनुष्य गति में आने वाला व्यक्ति 84 लाख योनियों के बीज अपने साथ लेकर आता है। देव क्या बनेगा, तय है। नारकीय क्या बनेगा, तय है। मनुष्य क्या बनेगा, यह जन्म से तय नहीं होता। ये कर्म से भी तय नहीं होता है। ये तय होता है कि उसको परिवार कौन सा मिलता है। एक पल को कल्पना करिए कि भीष्म पितामह को रघुकुल मिल जाता तो उनकी गरिमा और जीवन किस ऊंचाई पर होता। अगर राम को गुरुकुल मिल जाता तो राम क्या कर पाते! इस सच्चाई से कोई इनकार नहीं कर सकता है कि पराए दुश्मन से लड़ने में मर्दानगी होती है। जिनसे हम मोहब्बत करते हैं वही अगर दुश्मन बन जाएं तो लड़ने का मन नहीं करता है। इसलिए परिवार की जो नरक भूमि बनने की संभावना है या सिद्ध भूमि बनने की संभावना है, उसके लिए जिनेन्द्र कुल बनना चाहिए। मनुष्य जीवन में व्यक्ति बहुत पराधीन हो जाता है। गाय के बछड़े को चलना सिखाने की जरूरत नहीं पड़ती। वह जन्म लेते ही चलने लग जाता है। इंसान के बच्चे को बिठाओ नहीं तो वह जीवनभर बैठना भी नहीं सीख पाता है। वो सौभाग्यशाली हैं जिनको ऐसा परिवार मिलता है कि जो सिद्ध मार्ग पर जाने का संबल देते हैं।