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दान-धर्म कर करें संपत्ति का सदुपयोग क्योंकि सोचने-समझने का अवसर केवल मानव काे मिला है, पशुओं को नहीं : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

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रायपुर - संपत्ति का दुरूपयोग करना और सदुपयोग करना आपके हाथ में हैं। आपकी खुद की कमाई संपत्ति का आप कभी दुरूपयोग नहीं कर सकते हो। व्यक्ति अपने पुरखों की कमाई हुई संपत्ति का ही दुरूपयोग करता है क्योंकि उसे उनकी मेहनत का कद्र नहीं होता, वे समझ ही नहीं सकते हैं कि उनके पूर्वजों ने कितनी मेहनत से संपत्ति बनाई हैं। यह बातें एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला के दौरान गुरूवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कही। साध्वीजी कहती है कि पुरखों की कमाई हुई संपत्ति आपकी कभी नहीं हो सकती, जब तक आप उनका सदुपयोग न करें। आपके पूर्वजों ने आपको सिखाया भी है कि आपको संपत्ति का उपयोग कैसे करना है। कुछ लोग पूर्वजों से मिली संपत्ति को अपने सुख सुविधाओं के लिए उपयोग करते हैै तो कुछ लोग उस संपत्ति को दान-धर्म और मंदिर बनवाने में लगा देते हैं। जमीन और खेत को भी आप मंदिर के दान में दे सकते हैं। खेतों से उपजने वाले अनाज को बेजुबानों को दे सकते हैं। लेकिन आप ऐसा करते नहीं हो। जिस कुर्सी में आपके दादाजी-पिताजी बैठा करते थे, आज आप उन्हें आज दान नहीं करते हो। वह किसी जरूरतमंद के काम आ सकती है, पर आपको उसे दान करना अखरता है क्याेंकि वह हजारों रूपयों की हैं। आज तो बेटियों को भी संपत्ति में अधिकार मिलना शुरू हो गया हैं। कुछ बेटियां तो अपने पीहर का हिस्सा छोड़ देती है, यह कहकर कि वे अपने घर में खुश है, उन्हें कोई मतलब नहीं है। वहीं, कुछ बेटियां एक-एक टुकड़े के लिए अपने भाईयों से मनमुटाव कर लेती हैं। इन सब का समाधान हमारे पूर्वजों ने पहले ही कर दिया है, उन्होंने दान और धर्म का रास्ता दिखाया है। जीवन कैसे जीये विषय पर साध्वीजी कहती है कि सूर्याेदय सुप्रभात के साथ हो, पूरा दिन मंगलमय रहे, ऐसी कामना सबकी रहती हैं। हमारा दिन मंगलमय व्यतीत हो, इसके लिए हमें पुण्य चाहिए और पूर्व के साथ वर्तमान का पुण्य भी मायने रखता है। कई बार ऐसा होता कि व्यक्ति बहुत पुरूषार्थ करता है, बहुत मेहनत करता है उसके बाद भी उसे कामयाब होने में बहुत समय लग जाता है। ऐसे में मन व्यथीत हो जाता है, धर्म से भी मन उठने लगता है। आपको किसी भी कीमत पर धर्म नहीं छोड़ना चाहिए क्योंकि धर्म ही आपको विजय दिलाएगा। समय अपनी रफ्तार से आगे बढ़ रहा है और यह हमारे पास कितना बचा है, यह हमको पता नहीं है। लेकिन जितना बचा है, उसका हमें सदुपयोग करना है। कभी आपका ऑपरेशन हो तो डॉक्टर कहता है कि आज आपको सुबह से कुछ खाना-पीना नहीं है। इस अवसर समझदार व्यक्ति उपवास कर लेता है। आज आपको मानव जीवन मिला है, इसके पीछे जीव ने बहुत सहन किया है। आज हम सोच समझ सकते है और धार्मिक कार्य कर सकते है। इस भव में आप अपनी दिनचर्या देखे तो आज भोजन हमारी सबसे पहली जरूरत है। आपको भोजन की थाली में बस सिस्टमैटिक चाहिए। हमको जैसा चाहिए, वैसा नहीं मिला तो हमारा मन खराब हो जाता है। आपको भोजन के समय पसंद नापसंद नहीं करना चाहिए। गाय, कुत्ते, बिल्लियों को देखोगे तो उन्हें जो मिलता है, उन्हें मजबूरी में खाना पड़ता है। अगर आपकाे उनका भव मिल जाए तो आप कभी मना नहीं कर पाएंगे और जो मिलेगा वही भोजन खाना पड़ेगा। पर्वाधिराज पर्यूषण पर्व 13 अगस्त भी। मनोहरमय चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री सुशील कोचर और महासचिव श्री नवीन भंसाली ने बताया कि अक्षयनिधि, कसाय विजय और समवसरण तप चल रहा है। पर्वाधिराज पर्यूषण महापर्व का 13 अगस्त से प्रारंभ होने जा रहा है। वहीं, 17 तारीख, गुरूवार को सुबह 9 बजे से परमात्मा का जन्मवांचन महोत्सव और 20 तारीख, रविवार को संवत्सरी महापर्व मनाया जाएगा। समिति एवं श्रीसंघ सबसे अपील करती है कि आप सभी अधिक से अधिक संख्या में शामिल होकर लाभ लेवें। 21 दिवसीय दादा गुरूदेव इकतीसा 7 अगस्त से प्रारंभ हो चुका है। साथ ही 18 तारीख, शुक्रवार की रात महापुरूषों की प्रेरणादायक जीवंत झांकी का आयोजन किया जाएगा। बच्चे और महिलाएं इसमें जरूर हिस्सा लें। नवकार दरबार में प्रतिदिन रात 8 बजे आरती होती है और 8.15 बजे से 9.15 बजे दादा गुरूदेव की इकतीसा प्रारंभ होती है, आप सभी इसका लाभ लेवें।

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