रायपुर - तीर्थंकर का अर्थ है- जो तारे, तारने वाला। तीर्थंकर को अरिहंत कहा जाता है। मूलत: यह शब्द अर्हत पद से संबंधित है। अरिहंत का अर्थ होता है जिसने अपने भीतर के शत्रुओं पर विजय पा ली। ऐसा व्यक्ति जिसने कैवल्य ज्ञान को प्राप्त कर लिया। अरिहंत का अर्थ भगवान भी होता है। टैगोर नगर के श्री लालगंगा पटवा भवन में चल रहे चातुर्मासिक प्रवचन में उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने ये बातें कही।
उन्होंने बताया, तीर्थंकर बनने के लिए पार्श्वनाथ को नौ जन्म लेने पड़े। इतने जन्मों के संचित पुण्यों के बाद दसवें जन्म में वे तेईसवें तीर्थंकर बने। जैन धर्म में कुल 24 तीर्थंकर है दुनिया के सबसे प्राचीन जैन धर्म का संस्थापक ऋषभदेव को माना जाता है, जो जैन धर्म के पहले तीर्थंकर वे, वे भारत के चक्रवर्ती सम्राट भरत के पिता वे, वेदों में प्रथम तीर्थंकर ऋषभनाथ का उल्लेख मिलता है। महावीर स्वामी ने कैवल्य ज्ञान की प्राप्ति के बाद चार तीर्थों की स्थापना की साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका। यह सभी तीर्थ लौकिक तीर्थ न होकर एक सिद्धांत हैं। इसमें जैन धर्म के सिद्धांत सत्य, अहिंसा, अपिग्रह, अस्तेय ब्रह्मचर्य का पालन करते हए अपनी आत्मा को ही तीर्थ बानने की बात महावीर स्वामी ने बतायी है। महावीर जयंती पर जैन धर्म के अनुयायी महावीर जैन की श्रद्धा भाव से पूजा और अभिषेक करते हैं। और महावीर के सिद्धांतों को याद करते हुए उन सिद्धांतों पर चलने का प्रण करते हैं।