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योग-आसन मात्र चिकित्सीय विधि नहीं अपितु प्रबल आध्यात्मिक क्रिया है - डॉ. दानेश्वर टॅडन (आरोग्यम्- नगपुरा)

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दुर्ग - श्री उवसग्गहरं पार्श्व तीर्थ नगपुरा परिसर में संचालित प्राकृतिक एवं योगोपचार केन्द्र 'आरोग्यम्" के मुख्य चिकित्सा अधिकारी डॉ. दानेश्वर टंडन ने मानवीय जीवन में योग-आसन की महत्त्वत्ता पर परिचर्चा करते हुए साधको को संगोष्ठी में बतलाया की "योगासन मुख्य रूप से दो होते हैं - गतिशील आसन और स्थिर आसन। जिस आसन में शरीर शक्ति के साथ गतिशील रहता है, उसे गतिशील आसन कहते हैं। वे आसन जिनके अभ्यास में शरीर में बहुत ही कम या बिना गति के किया जाता है - स्थिर आसन कहलाता है। योग केवल एक चिकित्सीय विधि नहीं है, अपितु यह अपने आप में पूरा विज्ञान हैं। योग एक आध्यात्मिक क्रिया है।"" अष्टांग योग में आसन क्रिया का स्थान तृतीय है। चित्त की स्थिरता, शरीर एवं उसके अंगों की दृढ़ता और कायिक सुख के लिए आसन का अभ्यास महत्त्वपूर्ण हैं। अध्यात्म में अपनी आंतरिक क्षमता को बढ़ाने पर बल दिया गया। भीतर में जो अनन्त शक्ति है, उसका थोड़ा हिस्सा भी प्रकट होता है, भीतर में जो आनन्द का सागर लहरा रहा है, उसका छोटा अंश भी बाहर आता है, तो व्यक्ति कष्ट को आनन्द मानकर झेल लेता है। यदि भीतर का आनन्द जाग जाए. आंतरिक स्रोत फूट जाए तो, जीवन सुखद और आनन्द से परिपूर्ण बन जाता है।महर्षि पतंजलि ने आसन सिद्धि को कष्टों को सहन करने का उपाय बतलाया हैं। आसन सिद्ध हो जाने से व्यक्ति को द्वंद्व नहीं सताता। सर्दी-गर्मी, भूख-प्यास आदि द्वंद्व उसकी साधना में बाधक नहीं बनता हैं। आसन सिध्द कर द्वन्दों पर विजय प्राप्त किया जा सकता हैं। आसन सिद्ध करने से बोध शून्यता आती हैं। मात्र पांच दस मिनट पद्मासन या अन्य आसन करने से आसन सिद्धि नहीं होती। आसन सिद्धि के लिए कम से कम -डेढ़ घंटे से तीन घंटे का निरन्तर समय चाहिए। । आसन सिद्धि से बोध-शून्यता आ जाएगी, इसका अर्थ है -आसन सिद्धि से शरीर शिथिल बन जाएगा, फिर सर्दी गर्मी नहीं सताएगी। आसन कायसिध्दि का एक प्रयोग है, इसका कारण भी बहुत सुन्दर बतलाया गया। व्यक्ति को कष्ट होता है, चंचलता के कारण। जितनी चंचलता होगी उतनी ही पीड़ा होगी। जितनी चंचलता कम, उतनी पीड़ा कम!! जितनी स्थिरता, उतनी ही शान्ति ।! चंचलता और पीड़ा में गहरा सम्बन्ध है। आसन करने से और आसन सिद्धि होने से शरीर की चंचलता कम होती है!!, मन की चंचलता कम होती है तब संवेदना शून्यता आतो है, संवेदना कम हो जाती है। आसन से व्यक्ति की क्षमता और स्थिरता बढ़ जाती है। उससे वह द्वन्द्रों को झेलने में समर्थ बन जाता है। आसन-सिद्धि एक उपाय है- द्वन्द्रों को झेलने का,, शारीरिक और मानसिक क्षमता को बढ़ाने का। जब क्षमता और स्थिरता प्रबल बनती है,, परीषह अकिंचित्कर बन जाते हैं।

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