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मनुष्य की चाह और विधाता की राह, दोनों अलग होती है : - साध्वी शुभंकरा श्रीजी

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रायपुर - आप जैसा चाहते वैसा कभी नहीं होता है। अगर वैसा होने लग गया तो यह समझ लेना की भगवान का आप पर अनेको-अनेक आशीर्वाद है। अपने सपनों को पूरा करने के लिए हर युवा आज अपने गांव-शहर से निकलकर बड़े शहरों में जाना चाहता है। माता-पिता की सोच भी वही है कि हमारी संतान बड़े शहरों में जाकर पढ़े-लिखे और बड़ा आदमी बन जाए। बच्चें घर का स्वर्ग होते है और उनकी किलकारियों के गुंजने से ही घर स्वर्ग बनता है। पर आपने क्या कभी इस बात पर गौर किया है कि गांव के बच्चें पढ़ने-लिखने की ओर जाते है और शहर के बच्चे महानगर और विदेश जाकर पढ़ाई करते है। घर से बाहर रहकर वे पढ़ते है और बाहर ही नौकरी कर बाहर ही सैटल हो जाते है। उनके दादा-दादी उन्हें देखने को तरस जाते है और वे उनसे मिलने भी नहीं आते है। जिन्हें भी बच्चों से मिलना है तो उन्हें ही उनके पास जाना होता है क्योंकि बच्चें अपनी नौकरी से छूट्टी लेकर घर नहीं आते है। फिर क्या, आप भी हफ्ता-दस दिन रहकर वापस आ जाते है और घर में फिर आपको अकेलापन घेरने लग जाता है। यह अकेलापन व्यक्ति का सबसे बड़ा दुश्मन है। आपको अपने बच्चों को बचाना होगा। उन्हें अपने धार्मिक संस्कारों और परंपराओं से जोड़े रखिए क्योंकि बच्चे वैसा नहीं चलते जैसा आप चाहते है। मनुष्य की चाह और विधाता की राह दोनों विपरीत दिशाओं में आगे बढ़ती हुई कसौटी है। आप इन्हें नहीं रोक सकते पर इसे खींच कर रखना आपके हाथ में है। साध्वीजी ने आगे कहा कि परमात्मा की आज्ञा का हमें पालन करना है। हमें हमेशा मर्यादित कपड़े पहनना है। आज हम इस दिखावे की दुनिया में जी रहे है, जहां हमें लगता है कि हम भी चकाचौंध जीवन जीयेंगे तो सभी हमें देखेंगे, हमारी ही बातें करेंगे। लेकिन ऐसा नहीं है, कोई कभी किसी की बात नहीं करता, हां कभी किसी की तारीफ कर दिया तो वह अगल बात है। कोई भी आपके कपड़े, रहन-सहन, खान-पान के बारे में हमेशा बात नहीं करेगा। वह केवल क्षण भर के लिए आपकी तारीफ या बुराई की जाती है। क्या आपने किसी ऐसे व्यक्ति को देखा है जो दिन-रात, सुबह-शाम किसी की अनुमोदना करता हो, या किसी का दुष्प्रचार करता हो। ऐसा कोई व्यक्ति नहीं कर सकता। साध्वीजी कहती है कि आपके चकाचौंध कपड़ों को केवल क्षण भर के लिए देखा जाएगा और लोग अच्छी-बुरी प्रतिक्रियाएं देंगे। ऐसे कपड़ों में जो आपको देखने वाला होगा, उसकी क्या सोच हो सकती है यह आप अच्छी तरह समझ सकते है। हम कोई भी कार्य करे तो वह किसी को दिखाने के लिए नहीं बल्कि हमारे आत्मकल्याण के लिए होना चाहिए। आपको अपने आप को देखना है और स्वयं का आंकलन आपको खुद ही करना है। क्योंकि आप किसी से अपने बारे में, अपने कपड़ों, अपने रहन-सहन के बारे में पूछेंगे तो आपके सामने तो वह अच्छा ही बोलेगा। हो सकता है कि आपके पीठ पीछे वह आपके बारे मे विपरित बातें करें। तो यह जान लीजिए कि कोई आपको देखेगा नहीं, लोग केवल टिप्पणी करेंगे वह भी कुछ समय के लिए फिर वह भी भूल जाएंगे। साध्वीजी कहती है कि पर्युषण में इतनी शक्ति होती है कि हर व्यक्ति खुद ही मंदिर चला आता है। यह आपने पर्युषण के इन आठ दिनों में देख ही लिया होगा। मंदिर में कितनी भीड़ हुई कि पैर रखने की जगह नहीं थी। प्रतिक्रमण करने के लिए किसी को बताना नहीं पड़ता था, बच्चें भी खुद ही प्रतिक्रमण कर रहे थे। आप लोग खुद भी सभी रिश्तेदारों के घर गए, खमतखामणा की और देखते ही देखते पर्युषण पर्व भी चला गया। वैसे ही अब दिवाली आएगी और आप लोग सभी उसकी तैयारी में जुटेंगे, दिवाली मनाएंगे। फिर अगले दिन कुछ करने का मन होता है क्या। त्यौहार खत्म होता है और आप लोगों के अंदर उत्साह भी खत्म हो जाता है। दिवाली के बाद भाई दूज और उसके अगले दिन आप लोग अपने दुकानों में भी बे-मन से जाते हो। लेकिन क्या करें जाना पड़ता है, धंधे में नुकसान नहीं उठा सकते, भले की कोई ग्राहक आए न आए फिर भी आप दुकान खोलते हो। आप लोग मंदिर जाने में भी वैसे ही उत्साह खो देते हो। आपको हर दिन मंदिर जाना है, प्रभु से कम्युनिकेशन गैप नहीं करना है। जैसे आप अपने थोक विक्र्रेता, बाजार के व्यापारियों और ग्राहकों के साथ कम्युनिकेशन बनाए रखते है, ठीक वैसे ही।

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