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रिश्ते पाप को नष्ट और पुण्य को समाप्त कर सकते हैं : - प्रवीण ऋषि

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रायपुर - रिश्ते पुण्य कर्मों को समाप्त कर सकते हैं, पाप को भी समाप्त कर सकते हैं। रिश्ते कर्म और धर्म को बदल कर रख सकते हैं। कर्म और धर्म का खेल अकेले खेल सकते हैं, लेकिन रिश्तों का खेल अकेले नहीं खेला जा सकता। रिश्तों में आप यह नहीं जान पाते कि सामने वाला आपके प्रति क्या भावना रखता है। लेकिन आप अपनी भावना का खयाल रख सकते हैं। रिश्ते का खेल ताश के खेल की तरह है, सामने वाला कौन सा पत्ता चलेगा, आप नहीं बता सकते हैं, लेकिन सामने वाले की चाल को बदलने के लिए आप अपना पत्ता संभाल कर चलते हैं। ताश से भी भयंकर खेल है रिश्तों का। उक्त बातें उपाध्याय प्रवर प्रवीण ऋषि ने लालगंगा पटवा भवन में चल रही महावीर गाथा के 54वें दिन कहीं। उक्ताशय की जानकारी रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने दी। प्रवीण ऋषि ने कहा कि कर्म को लेकर एक प्रचलित धारणा है कि कर्म भोगे बिना मोक्ष नहीं मिलता है। उन्होंने कहा कि अगर पुराने पाप धोये जा सकते हैं तो भोगने की आवश्यकता क्यों? मिथ्या दृष्टि वाले को कर्म भोगना ही पड़ता है। भगवान महावीर कहते हैं कि कर्म के आगे झुकना नहीं, कर्म तुम्हारा गुलाम है, तुम उसके नहीं। आपको यह सोचना है कि कर्म मुझे नचाने वाला नहीं है, बल्कि मैं कर्म को नचाने वाला हूँ। धर्म, कर्म को भोगने के लिए नहीं है, बल्कि धर्म तो कर्मों का क्षय करने के लिए है। कर्म को चुनौती दीजिए, विजयी बनने की मानसिकता के साथ। रायपुर श्रमण संघ के अध्यक्ष ललित पटवा ने बताया कि प्रवीण ऋषि ने इस सोच को बदलने के लिए और कर्म को चुनौती देने के लिए खुद को तैयार करने अर्हम सीक्रेट्स ऑफ़ कर्मा शिविर शुरू किया है। उन्होंने इस प्रोजेक्ट की शुरुआत 2010 में की थी, और 2012 में उन्होंने पहला शिविर बेंगलुरु में आयोजित किया था। यह शिविर 51 दिन चला था। इसके बाद प्रवीण ऋषि ने 2018 से रेसिडेंशियल शिविर की शुरुआत की तो 72 घंटों का होता है। 2020 से ट्रेनर्स प्रोग्राम की शुरुआत हुई और 2025 तक 5000 कर्मा ट्रेनर्स तैयार करने की योजना है। रायपुर में भी यह शिविर जारी है और 2 सितंबर को ट्रेनर्स को सर्टिफिकेट सौंपे जाएंगे। इस सेशन में लगभग 78 टीचर्स ट्रेनिंग ले रहे हैं, जिनमे 12 जैन समुदाय से बाहर के हैं, वहीं एक टीचर मुस्लिम समुदाय का है। प्रवीण ऋषि कहते हैं कि इस कला में धर्म, जाति का कोई बंधन नहीं है। कोई भी इस शिविर में भाग ले सकता है। महावीर गाथा को आगे बढ़ाते हुए उपाध्याय प्रवर ने कहा कि धर्म का पहला प्रयास है कि युद्ध टल जाए, और अगर नहीं तो फिर एक मर्यादा में हो। और मर्यादा से युद्ध लड़ा जाए तो यह एक कला बन जाएगा। द्वन्द युद्ध की घोषणा हो गई। सबसे पहले नेत्र युद्ध हुआ। अश्वग्रीव और त्रिपुष्ठ एक दूसरे को घूर रहे हैं, एक दूसरे को घूरते हुए नीचा दिखाने की कोशिश कर रहे हैं, लेकिन अश्वग्रीव ज्यादा देर तक नहीं टिक सका। हार गया। इसके बाद बाहु युद्ध शुरू हुआ, उसमे भी अश्वग्रीव हार गया। तलवार, गदा, सभी विधाओं में अश्वग्रीव को पराजय का सामना करना पड़ा। जैसे जैसे वह हारता गया, उसका संतुलन बिगड़ने लगा और वह मर्यादा का उल्लंघन करने से पीछे नहीं हटा। वह दूर जाता है, और अपने चक्र का घूमना शुरू किया। जैसे ही दोनों सेना ने यह देखा उनकी ख़ुशी काफूर हो गई, उन्होंने सोचा अब त्रिपुष्ठ को कोई बचा नहीं सकता। वहीं तत्रिपुष्ठ ने हाथ जोड़े, आंख बंद कर अपने योगी गुरु का स्मरण किया। कहा, गुरुदेव आपने जिस विद्या को सिखाया था, अब उसे सार्थक करने का बल दो, आपके अरमानों को पूरा करने जा रहा हूँ, मुझे साहस दो। त्रिपुष्ठ को हाथ जोड़े देख अश्वग्रीव को लगा कि उसने हार स्वीकार कर ली है। नमस्कार कर माफ़ी मांग रहा है। लेकिन यह उसका अहंकार था। उपाध्याय प्रवर ने कहा कि हारने का मन्त्र है अहंकार और जीतने का मन्त्र है नमस्कार। नमस्कार पापों का अंत करता है। उन्होंने कहा कि ज्ञानदात को प्रणाम किए बिना उनके दिए ज्ञान का उपयोग मत करना। जो भी बिना अपने गुरु को नमन किए चला है, उसने अपने जीवन में नर्क को आमंत्रित किया है। अश्वग्रीव ने अपनी पूरी शक्ति से चक्र को फेंका, त्रिपुष्ठ ने अपने गुरु का स्मरण कर चक्र को देखा, चक्र धीमा होने लगा। सबकी आँखें फटी की फटी रह गई। अश्वग्रीव के पैरों तले जमीन खिसक गई। चक्र धीरे धीरे त्रिपुष्ठ के पास आया और उसने तर्जनी में चक्र को धारण कर लिया। अश्वग्रीव का पांसा उल्टा पड़ गया। त्रिपुष्ठ ने अपने गुरु को प्रणाम किया, कहा- आपके कारण यह चक्र मेरे पास आया है, आपके कष्टों को समाप्त करने के लिए मैं यह चक्र चलाने जा रहा हूँ। उसने अश्वग्रीव को देखते हुआ कहा- घोटकग्रीव, तूने मेरी गर्दन काटने के लिए यह चक्र चलाया था, ले मैं यह चक्र तेरे पास वापस भेज रहा हूँ, संभाल सकता है तो संभाल। यह कहते हुए त्रिपुष्ठ ने चक्र चलाया, लेकिन अश्वग्रीव चक्र चलना जनता था, उसे झेलना नहीं। चक्र चला, और अश्वग्रीव की गर्दन कटकर जमीन पर गिर गई। और चक्र, वापस त्रिपुष्ठ की तर्जनी पर विराजमान हो गया। जयघोष गूंजने लगे, सभी जयकारे लगा रहे थे त्रिपुष्ठ के। त्रिपुष्ठ को ऐसा लगा कि तमन्न पूरी हो गई, प्रतिशोध की यात्रा पूरी हो गई। लेकिन क्या यह सही है?

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