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पाप करते समय मन में ग्लानि आ जाए तो आपका जीवन कल्याणकारी बन जाएगा : साध्वी शुभंकरा श्रीजी

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रायपुर - एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मास 2023 की प्रवचन श्रृंखला के दौरान शनिवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि हमारे मन में तीन भाव होते हैं शुद्ध, अशुद्ध और विशुद्ध। यह भाव बार-बार बदलते रहते हैं और इससे अच्छा माना जाता है क्योंकि बार-बार बदलने से आज अगर किसी के भाव अशुद्ध है तो कल वह शुभ हो जाएंगे। आत्मा भी वैसी ही है लेकिन उसमें जो शुभ भाव उठते हैं वह टिकते नहीं और जो अशुभ भाव उठते हैं तो हम उसे अपना लेते हैं, स्थाई बना लेते हैं। हमारे मन में जो भाव हो आ रहे हैं वह पल-पल में बदलते भी जा रहे हैं। आप किसी का अच्छा सोच रहे हो और मनन करते-करते पता नहीं कब अशुभ विचार आपके मन में उसके प्रति आ जाए कहां नहीं जा सकता, यह क्षण भर में बदल जाता है। हमारे भव शुभ हो और प्रसंग शुभ हो तो जैसे आपका खाओगे वैसे ही आपके कर्म बनेंगे। कभी कोई पाप करते वक्त आपके मन में ग्लानि के भाव आ जाए तो यह भी जीवन के लिए कल्याणकारी सिद्ध हो सकता हैं। सब कुछ हमारे भावों पर निर्भर करता है जैसा हमारा भाव होगा वैसा ही हमारा कर्म बंधता चला जाएगा। वैसे तो हमारे हाथ में कुछ नहीं है पर हम अपने मन के भावों को कितना संभाल कर रखते हैं यह हमारे हाथ में है। पुण्य और पाप दोनों को हम ही बुलाते हैं - साध्वी जी कहती हैं कि अच्छा सोचो तो पुण्य का उदय होगा और बुरा सोचो तो पाप का उदय होता है। अपराध मन से होता है और गुनाह काया से। कोर्ट में अगर आप जाओ तो आपको वहां आपके गुनाहों की सजा मिलती है। आप अगर किसी के बारे में अपराधिक सोच रखते हो। किसी का बुरा सोचते हो या किसी का अहित सोचते हो तो आप को सजा नहीं होती है। पर धर्म सत्ता में ऐसा नहीं होता। परमात्मा के घर में अपराध की भी सजा मिलती है और यह सोच भी पाप की श्रेणी में आता है। एक चावल के दाने जितनी बड़ी तंदूली मछली, मगरमच्छ की आंख के भाव में बैठी रहती है। मगरमच्छ नदी के अंदर मुंह खोल कर बैठा रहता है। उसके सामने से मछलियां आना-जाना करती रहती है पर वह कुछ नहीं करता है। भव में बैठी मछली तंदूली सोचती है कि अगर इसकी जगह मैं होती तो सबको खा लेती। किसी को भी नहीं छोड़ती। साध्वीजी कहती है कि धर्मसत्ता में इस सोच को भी पाप कहा गया है। मन से सोचा गया किसी का अहित भी पाप की श्रेणी में आता है। बंद और मोक्ष दोनों का कारण का मन है। यहां फैसला आपको करना है कि आपको बंद होना है या फिर मोक्ष प्राप्त करना है। यहां मैं और मेरा बाहर की बात करता है बाहर से आप खुद को को मैं कहते हो। जबकि असम्य भाव में ऐसा नहीं होता। जब अहंकार पुकारे तो कहिए कि मैंने नहीं किया है। यह मैंने नहीं किया है यह तो आप लोगों के सहयोग से हुआ है। कोई दूसरा करें तो उसे क्रेडिट देने से आप कतराते हो और एक छोटे से काम को करने के बाद आप अपनी मैं का गुणगान करने लगते हो। साध्वीजी कहती है कि नीम का बीज लगाओगे तो आम का पेड़ नहीं होगा। चाहे आप कितना भी जाप कर लो लेकिन वहां नीम का पेड़ ही होगा। जब आप आम का बीज डालोगे तभी आम का पेड़ उगेगा। आप अपने आपको इतना बड़ा मत मानो कि आपको कोई झुका ना पाए। यह मोह है। मोह, शराबी की तरह होता है, उसे सत्य और असत्य का पता नहीं चलता। इसे छोड़ दो। माेह का त्याग करोगे तो स्थिर बनोगे। स्थिर बनोगे तो मग्नता आएगी और मग्नता से आप पूर्णता को प्राप्त कर सकोगे। मनोहरमय चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री सुशील कोचर और महासचिव श्री नवीन भंसाली ने बताया कि मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन 2023 ललित विस्त्रा ग्रंथ पर आधारित है। नवकार जपेश्वरी परम पूज्य शुभंकरा श्रीजी आदि ठाणा 4 के मुखारविंद से सकल श्री संघ को जिनवाणी श्रवण का लाभ दादाबाड़ी में मिल रहा है। साथ ही उन्होंने नगरवासियों से साध्वीजी के मुखारविंद से जिनवाणी का श्रवण करने का आग्रह किया है।

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