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सबसे पहले भगवान को भोग लगाओ, उसके बाद भोजन ग्रहण करो : - साध्वी शुभंकरा श्रीजी

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रायपुर - एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मास 2023 की प्रवचन श्रृंखला के दौरान बुधवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि आप घर में जो भी व्यंजन बनाते हो, उसका सबसे पहले परमात्मा को भोग लगाओ। वह मिठाई हो सकता है, कोई विशेष व्यंजन हो सकता है, जिसे आपने किसी विशेष मौके पर बनाया हो। केवल विशेष मौकों पर विशेष व्यंजन ही नहीं बल्कि आप हर दिन बनने वाले भोजन को भी भगवान को समर्पित कर सकते हो। साध्वीजी कहती है कि आपको अभक्ष्य व्यंजन नहीं चढ़ाना है। चढ़ाना ही नहीं आपको वह बनाना भी नहीं चाहिए, केवल साधर्मिक भोजन ही बनाना चाहिए। आप हर दिन भगवान को भोग लगाइए और उसे उसके बाद ग्रहण कीजिए। यह मत सोचना कि आप रोज भगवान को भोग लगा रहे हो, आपको केवल एक कटोरी ही भोजन भोग के रूप में चढ़ाना है। वैसे भी परमात्मा को भोग से कोई मोह नहीं होता। क्या परमात्मा आपके लगाए हुए भोग पर निर्भर रहते है, ऐसा नहीं है। भोग लगाते समय आपके भावों का महत्व होता है। आप कितने भी उच्च क्वालिटी की मिठाई, मंहगे भोग चढ़ा लो अगर आपके भाव नहीं होंगे तो कोई मतलब नहीं है। हम भोग परमात्मा का आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए लगाते है। जीवन में परमशांति बनी रहे इसके लिए हमें परमात्मा द्वारा दिये गए अनेकांतवाद के सिद्धांतों का अनुसरण करना होगा। अनेकांतवाद जैन धर्म के सबसे महत्वपूर्ण और मूलभूत सिद्धान्तों में से एक है। मौटे तौर पर यह विचारों की बहुलता का सिद्धान्त है। अनेकांतवाद की मान्यता है कि भिन्न-भिन्न कोणों से देखने पर सत्य और वास्तविकता भी अलग-अलग समझ आती है। अतः एक ही दृष्टिकोण से देखने पर पूर्ण सत्य नहीं जाना जा सकता। वैसे तो कर्म सिद्धांत का अध्ययन कर रहे हैं। हमारे भाव क्षण-क्षण में बदलते रहते है। दिन में कई बार उतार-चढ़ाव के प्रसंग हमारे सामने आते है। क्या हम उनके साथ उनकी धारा में बह जाते है। हम ऐसा नहीं करते, बल्कि हम किनारे पर आकर न्यायोचित तरीके से सोच-समझकर फैसला लेते है। एक कुम्हार घड़ा बनाता है, इसके लिए उसे मिट्टी, रंग, चाक, पानी की आवश्यकता पड़ती है। अब जब घड़ा अपना रूप ले लेता है तो उसे चाक के हटा दिया जाता है, फिर वह कुम्हार से भी दूर हो जाता है। घड़े के लिए सब निमित्त होता है और केवल मिट्टी ही उपादान होता है। वैसे ही हमारा मन बहुत दौड़ता है और थक जाता है। सोने के दौरान भी वह इधर-उधर भागता रहता है, शरीर भले ही स्थिर हो जाता है लेकिन मन दौड़ रहा होता है। ऐसा होने से आपको सोने के बाद भी आराम नहीं मिलता और शरीर में स्फूर्ति नहीं आती है। आप अपने मन को केवल एक ही काम में उलझा कर रखो, कई कामों में एक साथ उलझाओगे तो परिणाम कुछ नहीं निकलेगा। आप वहीं के वहीं खड़े रह जाओगे कहीं पहुंच नहीं पाओगे। मनोहरमय चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री सुशील कोचर और महासचिव श्री नवीन भंसाली ने बताया कि मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन 2023 ललित विस्त्रा ग्रंथ पर आधारित है। नवकार जपेश्वरी परम पूज्य शुभंकरा श्रीजी आदि ठाणा 4 के मुखारविंद से सकल श्री संघ को जिनवाणी श्रवण का लाभ दादाबाड़ी में मिल रहा है। साथ ही उन्होंने नगरवासियों से साध्वीजी के मुखारविंद से जिनवाणी का श्रवण करने का आग्रह किया है।

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