रायपुर - एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की चतुर्थ प्रभात पर शुक्रवार को नवकार जपेश्वरी साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि निंद्रावस्था और अर्द्धचेतन अवस्था दोनों में अंतर है। अर्द्ध चेतन अवस्था के दौरान कई बार हमें भी कुछ ऐसे स्वप्न आते है। जिनके पीछे कुछ संकेत होते है। स्वप्न कई बार हमें सचेत भी करते है। भगवान महावीर जब माता त्रिशला के गर्भ में पधारे तब माता को 14 भव्य नजारे स्वप्न में नजर आए थे। संकेत यह स्पष्ट कर रहे थे की गर्भ में स्थान लेने वाला जीव बहुत मजबूत, साहसी और सद्गुणों से भरा होगा। वह बहुत धार्मिक होगा और एक महान राजा या आध्यात्मिक नेता बनेगा। वह धार्मिक व्यवस्था में सुधार और पुनर्स्थापना करेगा। वह जीवन और मृत्यु से परे हो जाएगा। वह स्वयं भी मोक्ष में जाएगा और ब्रह्मांड के सभी प्राणियों को मोक्ष प्राप्त करने के लिए मार्गदर्शन करेगा। साध्वीजी ने माता त्रिशला के 14 स्वप्नों का वर्णन करते हुए बताया कि पहले स्वप्न में माता को गजराज नजर आए थे। इस सपने ने संकेत दिया कि असाधारण चरित्र गर्भ में स्थापित हुआ है। यह स्पष्ट कर रहा था की यह जीव सम्पूर्ण जगत के लिए एक अलग ही आध्यात्मिक चेतना का मार्गदर्शन करेगा। माता ने दूसरे स्वप्न में एक वृषभ यानी बैल के दर्शन किए थे। यह संकेत था कि गर्भ का जीव महान आध्यात्मिक शिक्षक होगा। वह धर्म की फसल लहलहाएगा। तीसरे स्वप्न में सिंह दिखा जो कि शक्तिशाली और मजबूत होकर निडर, सर्वशक्तिमान और दुनिया पर राज करने में सक्षम होने का संकेत था। चौथे स्वप्न में उन्हें माता लक्ष्मी के दर्शन हुए। धन, समृद्धि और शक्ति की देवी के स्वप्न में आने से यह स्पष्ट था कि गर्भस्थ जीव को धन और वैभव की कोई कमी नहीं रहेगी और वह एक उत्कृष्ट दानी होगा। वैसे ही पांचवें स्वप्न में माता त्रिशला ने आकाश से उतरती एक सुंदर पुष्पमाला देखी। इस सपने का संकेत था कि गर्भस्थ जीव के शिक्षण की खुशबू पूरे ब्रह्मांड में फैलेगी, और वह सभी का सम्मान करेगा। उन्होंने छठवें स्वप्न में पूर्णिमा का चन्द्र देखा था। इससे संकेत यह माना गया कि गर्भस्थ जीव जगत के सभी प्राणियों के दुख को कम करने में मदद करेगा। वह शीतलता और शांति के लिए समर्पित होगा और संपूर्ण मानवता की आध्यात्मिक प्रगति में मदद करेगा। वैसे ही उन्हें सातवें स्वप्न में चमकदार किरणों से युक्त सूर्य दिखाई दिया। इससे माना गया कि गर्भस्थ जीव को सर्वाेच्च ज्ञान होगा और वह भ्रम के अंधेरे को दूर कर देगा। साध्वीजी ने आगे कहा कि माता त्रिशला ने अपने आठवें स्वप्न में सुनहरी छड़ी पर लहराते एक विशाल ध्वज का दर्शन किया। यह संकेत था कि उनकी संतान धर्म को लेकर आगे बढ़ेगा और पूरे ब्रह्मांड में धार्मिक व्यवस्था को बहाल करेगा। नवम स्वप्न में शुद्ध एवं स्वच्छ जल से भरा हुए एक स्वर्ण कलश दिखाई दिया। यह कलश शुद्ध स्वच्छ जल से भरा था। इस सपने ने संकेत दिया कि गर्भस्थ जीव सभी गुणों में परिपूर्ण होगा और सभी जीवित प्राणियों के लिए दया से भरा होगा। दसवें सपने में माता ने खिलते कमल के फूलों से भरी झील का दर्शन किया। इससे यह माना गया कि आने वाली संतान सांसारिक लगाव से परे अध्यात्म का पुष्प पल्लवित कराएगा। वह प्राणी मात्र को संसार के सुख-दुखों से परे रहने और जन्म-मरण से मुक्त होने का बोध देगा। ग्यारहवें सपने में उन्हें क्षीरसागर का दर्शन हुआ, जिससे यह माना गया कि गर्भस्थ जीव ज्ञान का अथाह सागर होगा। वह असीम ज्ञान प्राप्त कर सांसारिक जीवन से मुक्ति की राह पर चलेगा और अन्य सभी के लिए इस राह को प्रस्थान करेगा। बारहवें सपने में उन्होंने देखा कि आकाश में एक देव विमान विचरण कर रहा है। संकेत यह माना गया कि ब्रह्मांड की सभी दिव्य आत्माएं गर्भस्थ जीव की आध्यात्मिक शिक्षाओं का सम्मान करेंगे। तेरहवें स्वप्न में माता ने रत्नों का दर्शन किया। यह संकेत था कि गर्भस्थ जीव का अनंत गुण और ज्ञान संसार सागर में फैलेगा। माता ने अपने चौदहवें सपने में धुंए से रहित प्रज्ववलित अग्नि देखी। इस सपने ने संकेत दिया कि गर्भस्थ जीव संसार से अज्ञान रूपी धुंए को दूर करेगा। अंध-विश्वास और रूढ़िवादी संस्कारों से परे जाकर ज्ञान की अग्नि प्रज्ववलित करेगा। वह अशुभ कर्मों को तप की अग्नि से जलाने का ज्ञान देगा। मनोहरमय चातुर्मास समिति के अध्यक्ष श्री सुशील कोचर और महासचिव श्री नवीन भंसाली ने बताया कि मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन 2023 ललित विस्त्रा ग्रंथ पर आधारित है। नवकार जपेश्वरी परम पूज्य शुभंकरा श्रीजी आदि ठाणा 4 के मुखारविंद से सकल श्री संघ को जिनवाणी श्रवण का लाभ दादाबाड़ी में मिल रहा है। साथ ही उन्होंने नगरवासियों से साध्वीजी के मुखारविंद से जिनवाणी का श्रवण करने का आग्रह किया है।