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ध्यान से तनाव मुक्ति, प्रसन्नता, संतोष, संवेग नियंत्रण और अंतर्दृष्टि का विकास होता है - प्रवक्ता उपासक दिनेश कोठारी

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बिलासपुर - श्री दशा श्रीमाली स्थानकवासी जैन संघ द्वारा टिकरापारा जैन भवन में पर्युषण महापर्व का आज सातवां दिवस है । आज के दिन बहनों ने अपने व्याख्यान में कहा जिसका शीर्षक था "मेरी मानव यात्रा" मनुष्य जीवन में मनुष्य को अपने दोषों को दूर करना, मन की शुद्ध करना, गुना में वृद्धि करना, आत्मा की समाधि और परम दयालु पवित्र प्रभु परमात्मा के दर्शन करने तक की पुरी यात्रा में आत्मा को परम आत्मा बनाने का प्रयास करते रहना चाहिए। और यह पर्युषण महापर्व आपको परमात्मा तक पहुंचने का उत्तम मार्ग दिखाएगा और मोक्ष प्राप्ति करने के लिए सहायक बनेगा। यह तो सभी जानते ही हैं की इस ब्रह्मांड में सभी जीव, जंतु, मनुष्य, पक्षी सभी के अंतर मन में भगवान बसते हैं इसीलिए प्रत्येक जीवो से मैत्री करना चाहिए और महावीर स्वामी के उद्देश्यों को *जियो और जीने दो* एवं *अहिंसा परमो धर्म* को नहीं भूलना चाहिए। हर मनुष्य के मन में दूसरों के प्रति संवेदना होनी चाहिए, प्रत्येक जीवों से प्रेम भावना रखने चाहिए किसी भी आत्मा से द्वेष या दुश्मनी नहीं रखनी चाहिए इस दुनिया में प्रत्येक जीवो को मित्र समझ कर आनंद में रहना चाहिए। क्योंकि आत्मा की शुद्धि किए बिना सिद्धि प्राप्त नहीं होती, पहले अपने दोषों का अवलोकन करें और दूसरों के गलतियों को नजर अंदाज करना सीखें इससे पापों का नाश होगा और पुण्य का उदय होगा जो कि हमारे जीवन चरिया को सरल बनाएगा। प्राण महीना मंडल के सदस्यों द्वारा आज सभी तपसियों के घर जाकर सुखसता पूछी गई एवं तपस्वियों की अनुमोदना की गई। आज के प्रवचन में समाज के अध्यक्ष भगवान दास भाई सुतारिया, शरद दोशी, प्रवीण दामाणी, शैलेश तेजाणी, हितेश सुतारिया, गोपाल वेलाणी, नरेंद्र तेजाणी, राकेश तेजणी, पारुल सुतारिया, निशा दोशी, भावना गांधी, तरुणा देसाई, स्मिता सुतारिया, करिश्मा देसाई, दीपिका गांधी, मीना तेजाणी, सुधा गांधी, अर्चना वेलाणी, शीतल तेजाणी, उर्मिला तेजाणी, श्रुति कोठारी और भी अधिक मात्रा में समाज के सभी सदस्य मौजूद थे। तेरापंथी जैन समाज द्वारा वैशाली नगर में...... तेरापंथी जैन समाज द्वारा वैशाली नगर में ध्यान दिवस पर जाप और प्रेक्षा ध्यान के बाद उपासक जयन्तीलालजी ने बताया कि ध्यान से वैराग्य, तत्त्व विज्ञान, निर्ग्रंथता, समचित्तता और सहनशक्ति का विकास होता है। ध्यान से तनाव मुक्ति, प्रसन्नता, संतोष, संवेग नियंत्रण और अंतर्दृष्टि का विकास होता है । प्रवक्ता उपासक दिनेश कोठारी ने कहा कि ध्यान का विकास बौद्ध धर्म, हिन्दू धर्म और जैन धर्म में बहुत हुआ है। आगम में आर्त्त ध्यान, रौद्र ध्यान, धर्म ध्यान और शुक्ल ध्यान के बारे में बताया गया है। इनमें से पहले दो एकांत अशुभ और छोड़ने योग्य हैं। अंतिम दो करणीय हैं। फिर इनकी विस्तार से चर्चा कर प्रेक्षा ध्यान की विविध पद्धतियों कायोत्सर्ग, अंतर्यात्रा, शरीर प्रेक्षा, श्वास प्रेक्षा, चैतन्य केंद्र प्रेक्षा, लेश्या ध्यान, जाप और अनुप्रेक्षा के बारे में बताया। ध्यान साधने के लिए भावक्रिया, प्रतिक्रिया विरति, मैत्री, मिताहार और मितभाषण का भी बड़ा महत्त्व है। इस अवसर पर भीखम दुग्गड़, रमेश नाहर, चंद्र प्रकाश बोथरा, अमित बोथरा, इंदर चंद बैद, मनोज धारीवाल, पुनीत दुग्गड़, कन्हैयालाल बोथरा, मेहुल छल्लानी, बिनोद लूनिया, शीला छल्लानी, नीतू जैन, कमला दुग्गड़, भारती भंसाली, सारिका नाहर, भावना जैन, ललिका जैन, संगीता जैन, कांवरी जैन, कुसुम लूनिया, अर्चना नाहर, सोनम नाहर, अंजू गोलछा, निकिता गोलछा सहित समाज के लोग उपस्थित थे।

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