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संवत्सरी महापर्व : - पर्वाधिराज पर्युषण पर्व की अष्टम प्रभात पर साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा  -  वैभव चाहे जितना हो मगर वह त्याग के सामने बहुत छोटा है।

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रायपुर - एमजी रोड स्थित जैन दादाबाड़ी प्रांगण में चल रहे मनोहरमय चातुर्मासिक प्रवचन श्रृंखला में संवत्सरी महापर्व मनाया गया। महापर्व के दौरान मूल बारसा सूत्र का वांचन किया गया। वांचन के बाद दादाबाड़ी से सदर बाजार स्थित श्री ऋषभदेव मंदिर तक चैत्य परिपाटी निकाली गई। पर्वाधिराज पर्युषण महापर्व की अष्टम प्रभात पर मंगलवार को साध्वी शुभंकरा श्रीजी ने कहा कि तपस्या तन की साधना है पर वह मन को साधे बिना नहीं हो सकती। लंबी-लंबी तपस्याएं केवल मन के बलबूते हुआ करती हैं। तपस्या ही व्यक्ति के कर्म को काटती है। नए कर्म न बंधें, इसके लिए व्यक्ति को तप चारिर्त््य पालन करना पड़ता है पर पुराने कर्म अर्थात् पूर्व निकाचित कर्मों को काटने के लिए केवल तप ही एक मार्ग है। यह जिनशासन की धन्यता है कि इसमें सदियों पूर्व से त्याग-तपस्या की परम्परा रही है। त्यागी-तपस्वियों की जो सेवा-सुश्रुषा करता है वह भी पुण्य का भागी बन जाता है, उसकी सेवा कभी व्यर्थ नहीं जाती। वैभव को भोगने वाले भुला दिए जाते हैं मगर त्याग करने वाले हमेशा याद किए जाते हैं। जिंदगी में डरना है तो अशुभ कर्मों से डरो साध्वीजी ने आगे कहा कि जिंदगी में डरना है तो अशुभ-अनिष्टकारी कर्मों से डरो क्योंकि कर्मों ने तो भगवान को भी नहीं छोड़ा, कर्म उनके पीछे भी पड़े रहते हैं। हमें हमारे देश की माटी पर गौरव है क्योंकि इस माटी ने जब-जब भी सम्मान-श्रद्धा दी है, तब-तब त्याग और तप को ही सम्मान-श्रद्धा दी है। सिकंदर के पास वैभव ज्यादा रहा और भगवान महावीर के पास त्याग ज्यादा है, यदि दोनों की मूर्ति आपके सामने है तो आगे आकर किसे प्रणाम करने का आपका मन करेगा? वैभव कितना भी महान क्यों न हो पर त्याग के सामने वह हमेशा बौना होता है। इतिहास में वैभव-संपत्ति, सत्ता-सुंदरी के गर्व में जीने वाले हजारों राजा हुए जो काल के गाल में समा गए। लेकिन महावीर और बुद्ध जैसे त्याग-तप व संयम को जीने वालों की दुनिया में आज भी पूजा होती है। दुनिया में आदमी चेहरे से नहीं चरित्र से महान हुआ करता है। महावीर की अहिंसा, बुद्ध की करूणा, राम की मर्यादा और कृष्ण के निष्काम कर्मयोग को जन्म देने का सौभाग्य इसी देश की माटी को है। हमारे देश में हीरे वे नहीं हैं जो जमीन से निकलकर आते हैं, हीरे वे हैं जो तप-त्याग, तपस्या-साधना के प्रताप से महान हुए हैं। लोगों का दिल जीतने में चेहरे की भूमिका केवल 10 परसेंट होती है पर चरित्र ही उसमें 90 परसेंट भूमिका अदा करता है। चेहरे की अवस्था को बदलना हमारे वश में नहीं है पर हमारे जीने का ढंग कैसा हो यह तो हमारे हाथ में अवश्य है। साध्वीजी ने आगे कहा कि हर व्यक्ति को अपने जीवन में त्याग और तपस्या को जरूर जोड़ लेना चाहिए। तपस्या ही आपके पूर्व निकाचित कर्मों को काटती अर्थात् खपाती है और तपस्वी को रोगमुक्त भी करती है। ज्यादा खाने और ज्यादा वैभव में रहने से आदमी ज्यादा बीमार पड़ा करता है। तपस्या आपके तन-मन की समस्या को मिटाती है। हमारे समक्ष ऐसे अनेक आदर्श हैं जिन्होंने रोगग्रस्त होते हुए भी तपस्या करतेे-करते शरीर को ऐसे साधा कि वे रोगमुक्त हो आज भी 90 की उम्र में चंगे हैं और साधनारत हैं। शरीर की स्वस्थता के लिए महात्मा गांधी ने एक समय भोजन का प्रयोग शुरू किया था, वे कहा करते थे कि तप करने से पहले जो कुछ खाया-पिया है वह सब बाहर निकल जाएगा तो शरीर अपने-आप स्वस्थ हो जाएगा। अहिंसा अवतार भगवान श्रीमहावीर ने हमें जीयो और जीने दो का सिद्धांत दिया था, पर आज हमने उसे पलटकर जीमो और जीमणे दो कर दिया है। और इसी परम्परा ने हमारे शरीर में नए-नए और अलग-अलग तरह के रोग पैदा कर दिए हैं। खा-खा के आदमी कितना भी खा ले पर न तो तन तृप्त होता है और न मन। हमारा धर्म-कर्म और धर्म-पालन केवल मंदिरों, धर्मस्थलों तक ही न हो अपितु धर्म का पालन जीवन के हर कार्यों व कार्यक्रमों में भी हो।

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