चेन्नई, 24 सितम्बर - पूज्य खरतरगच्छात्रापति गुरुदेव श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म. ने सुवार्म सभा प्रवचन मंडप में विशाल नार्मसभा को संबोलित करते हुए कहा- साधना के बिना सिद्धि को प्राप्ति नहीं हो सकती। साधना के लिये संकल्प चाहिये। संकल्प के लिये रूचि चाहिये और रूचि के लिये बोध चाहिये। इन चारों पगधियों पर क्रमशः चलकर ही हम सिद्धि को प्राप्त कर सकते हैं। इन चारों पराधियों को शास्त्रकारों ने इच्छा योग प्रवृत्ति योग, स्थिरता योग और सिद्धि योग कहा है। उन्होंने कहा- हम भोजन और पानी की चिंता करते हैं, लेकिन ऑक्सीजन की नहीं। शरीर और मन की चिंता करते हैं, पर आत्मा की नहीं। सत्ता, संपत्ति, सौन्दर्य की चिंता करते हैं, पर समय की नहीं। जबकि आत्मा और समय ही मुख्य है। क्योंकि आत्मा है तो शरीर है। आत्मा के जाते ही शरीर मृत्यु को प्राप्त कर लेता है। शरीर का अस्तित्व आत्मा के कारण है। पर हम आत्मा की चिता नहीं करते। यदि आत्मा की चिंता करते होते तो जीवन बदला हुआ होता, हर समय की कॉमत करते हमारे पास समय बहुत कम है, पर उसका उपयोग नहीं करते। उन्होंने कहा- पैसों के इन्वेस्ट की योजना बनाते हैं, पर समय की योजना कभी नहीं बनाई। जबकि पैसा महत्त्वपूर्ण नहीं है। क्योंकि पैसा खोने के बाद दुबारा पाया जा सकता है। पर समय एक बार खोने के बाद दुबारा नहीं मिलता। उन्होंने कहा- हमारे पास समय कितना है, इसका हमें कोई बोध नहीं है। लेकिन यह तय है कि समय की अपनी सीमा है। हमारे पास समय असीमित नहीं है। उन्होंने सूरिमंत्र साधना का विशेषता का वर्णन करते हुए कहा- सूरि मंत्र अपने आप में अत्यन्त गोपनीय विधान है। इन मंत्रों के जाप से विशिष्ट प्रकार की उर्जा प्राप्त होती है। पूज्य आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरि आज चौथो पीठिका गणिपिटक यक्षराज के अवसर पर बोल रहे थे। इस पीठिका का प्रारंभ 17 सितम्बर 2023 से किया था। आठ दिनों की इस पीठिका का आज समापन हुआ। इस अवसर पर महामांगलिक का आयोजन किया गया, जिसे श्रद्धा के साथ श्रवण करने के लिये पूरे भारत से हजारों लोगों का आगमन हुआ। सभा का संचालन करते हुए पू. मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म. ने पांच पीठिकाओं का वर्णन करते हुए कहा- इसके द्वारा सरस्वतीदेवी, त्रिभुवन स्वामिनी देवी महालक्ष्मी देवी, गणिपिटक यक्षराज एवं गौतम स्वामी की आराधना की जाती है। पूज्यश्री ने पांचों पीठिकाओं की विधिवत् आराधना की है। यह आराधना के दूसरी बार कर रहे हैं। इस अवसर पर उद्बोधन देते हुए पू. मुनि श्री मलयप्रभसागरजी म. ने पूज्य गुरुदेव आचार्यश्री के जीवन की विशिष्टताओं का वर्णन किया। उन्होंने कहा- पूज्यश्री जितने सरल हैं, उतने ही सहज भी उनके गुणों का वर्णन करना संभव नहीं है। पू. साध्वी प्रज्ञाश्रीजी मनोरमाश्रीजी अभिनदिता श्रीजी विश्रुतप्रभाश्रीजी ने साध्वी मंडल की ओर से शुभकामनाएं देते हुए संयम के उपकरण पूज्य आचार्यश्री को भेंट किये। उन्होंने पूज्य मुनि मयूखप्रभसागरजी द्वारा रचित भजन सुनाया। साध्वी प्रियसौम्यांजनाश्रीजी ने पूज्यश्री के गुणों का वर्णन किया। भूपेश रांका ने भी अपने भावों को व्यक्त किया। इस समारोह को पूज्य गुरुदेव गच्छाधिपति आचार्यश्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. पूज्य गणिवर्य श्री मयकप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री विरक्तप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मलयप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मुकुन्दप्रभसागरजी म.पू. मुनि श्री मृणालप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री मुकुलप्रभसागरजी म. पू. मुनि श्री महर्षिप्रभसागरजी म. पू. बाल मुनि श्री मीतप्रभसागरजी म. आदि मुनि मंडल एवं पूजनीया महत्तरा पद विभूषिता श्री चंपाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया गणिनी प्रवरा श्री सूर्यप्रभाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री पूर्णप्रभाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री हर्षप्रज्ञाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री हर्षपूणां श्रीजी म. आदि ठाणा एवं पूजनीया गणिनी प्रवरा श्री सुलोचनाश्रीजी म.सा. की शिष्या पूजनीया साध्वी श्री प्रियसीम्यांजनाश्रीजी म. पू. साध्वी श्री प्रियस्वणजनाश्रीजी म. आदि साध्वी मंडल का पावन सानिध्य मिला। पीठिका का लाभ धोरीमन्ना निवासी हिन्दुमलजी पुखराजजी सुरेशकुमारजी लूणिया परिवार ने लिया। पूज्यश्री के गुरुपूजन का लाभ इचलकरंजी निवासी श्री माणकमलजी सुशीलादेवी ललवानी परिवार ने लिया। तथा रजत मय अक्षतों से बचाने का लाभ मांडवला निवासी श्री रिखबचदजी राजेन्द्रकुमारजी दातेवाडिया परिवार ने लिया। अन्त में पूज्य आचार्यश्री ने प्रभावक बीजमंत्रों से युक्त महामांगलिक सुनाई जिसे उपस्थित 3 हजार से अधिक लोगों ने पूर्ण श्रद्धा व मौन के साथ सुना। इस अवसर पर विधिकारक हेमन्त भाई तथा मुकेश प्रजापत का बहुमान किया गया। श्री मोहनजी मनोजजी बंधु बेलडी ने भक्ति में तन्मय किया।इससे पूर्व साधना पूर्ण होने के उपलक्ष्य में पूज्यश्री का बैंडबाजे के साथ गौतम किरण सुधर्मा सभा मंडप में प्रवेश करवाया। इस अवसर पर इचलकरंजी, सूरत, दुर्ग, रायपुर, जयपुर, जोलापुर, बाडमेर, बालोतरा, सांचोर, अहमदाबाद, राजनांदगाव, नामतरी, बैंगलोर, मुंबई, गुंदुर, विजयवाडा, तिरपातूर, कोयम्बतूर, ईरोड, तिरपुर, सेलम, हैदराबाद। सिकन्द्राबाद, हुबली, बल्लारी, गदग, वेल्लूर, पांडिचेरी, टिण्डीवनम्, बाडमेर, चौहटन, धोरीमन्ना, सांचोर, चितलवाना, सेवाडा, भीलवाडा, मन्दसौर, नीमच, इन्दौर, उज्जैन, आदि पूरे भारत से भक्तों का आगमन हुआ।