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सेलम में दो दीक्षाओं व एक बडी दीक्षा के साथ प्राण प्रतिष्ठा महोत्सव संपन्न।

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सेलम 21 जनवरी - सेलम नगर में आज प्रातः शुभ मुहूर्त में पन्नालाल गौतमचंद कवाड परिवार द्वारा निर्मित जिन मंदिर में मूलनायक सीमंधर स्वामी, गणधर गौतम स्वामी, दादा जिनकुशलसूरि, सरस्वती देवी व पद्द्मावती देवी की रत्नमयी प्रतिमाओं की अंजनशलाका प्रतिष्ठा संपन्न हुई। उसके बाद सात माह पूर्व तिरपातूर में दीक्षित साध्वी प्रियमितांजनाश्रीजी की बड़ी दीक्षा एवं मुमुक्षु पूजा पारख व मुमुक्षु दिव्या आबड की भागवती दीक्षा का मंगल विधान संपन्न हुआ। साथ ही ललित कवाड व सौ. कविकला कवाड ने बारह व्रत ग्रहण करके अपने जीवन को पूर्ण धर्ममय बनाया। पहले ओम् पुण्याहं पुण्याहं के मंत्रोच्चारणों के साथ परमात्मा को गादीनशीन किया गया। प्रतिष्ठा से पूर्व आचार्यश्री ने भजन प्रस्तुत कर वातावरण को भक्तिमय बना दिया। प्रतिष्ठा व दीक्षा के इस अवसर पर मंदिर निर्माता कवाड परिवार के पारसमल, पुखराज, धर्मचंद, अशोक, आनंद, सुरेन्द्र, पदम, ललित, बंटी आदि पूरा परिवार उपस्थित था। सेलम जैन श्री संघ समस्त व खरतरगच्छ संघ सेलम, इरोड संघ, तिरपुर संघ, कोयम्बतूर संघ आदि ने कवाड परिवार का बहुमान किया। मुमुक्षु पूजा व दिव्या को विजय तिलक लगाकर विदाई दी। दीक्षा की समस्त औपचारिक विधि की पूर्णता के पश्चात् आचार्यश्री ने उन्हें समस्त सांसारिक जीवन के त्याग का संकल्प करवाया। बाद में उनका नाम परिवर्तित करते हुए पूजा का नाम प्रियशिक्षांजनाश्रीजी व दिव्या का नाम प्रियदीक्षांजनाश्रीजी घोषित किया। दीक्षा विधान से पूर्व दोनों मुमुक्षुओं के परिवार जनों ने सकल संघ की साक्षी से दीक्षा ग्रहण करने की अनुमति प्रदान की। इस अवसर पर खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने विशाल जनसभा को संबोधित करते हुए कहा - हृदय से परमात्मा की भक्ति करने वाला कभी भी भयग्रस्त नहीं हो सकता। परमात्मा की भक्ति की परिभाषा बताते हुए उन्होंने कहा- परमात्मा के गुणों को अपने हृदय में स्थान देना ही परमात्मा की सच्ची भक्ति है। अपने अन्तर मन में जन्मों से भरे दुर्गुणों के कचरे को दूर कर सद्गुण की सुवास फैलाना, यही परमात्मा की भक्ति है। हमारे अन्तर में अनादिकाल से ईर्ष्या, वासना, काम, कोध, अहंकार, माया, लोभ भरे पड़े हैं। परमात्मा के शासन को प्राप्त कर अपने अन्तर में सरलता, सहजता, समता, सादगी का विकास करना है। उन्होंने कहा- जीवन में चल रही भाग दौड़ के बीच आत्म तत्व की प्राप्ति के लिए परमात्मा से बढ कर और कोई उपाय नहीं है। प्रभु मंदिर से निरन्तर जुड़ाव जहाँ हमें विकृत होने से बचाता है, वहीं हमें जीवन के परिणामों को सजगता से पाने की प्रेरणा देता है। यह हमें जीवन का लक्ष्य निर्धारित करने का मार्ग दिखाता है जिन पर चलकर हम परम शांति का अहसास करते हैं। धर्मसभा को संबोधित करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भौतिक सुख सुविधाओं का संकलन कभी स्थायी शांति का आधार नहीं बन सकते, जन्म हुआ है तो मृत्यु निश्चित है। हमने यदि जीवन का लक्ष्य निर्धारित नहीं किया तो सब व्यर्थ। हमारा लक्ष्य होना चाहिए कि जीवन महोत्सव बने न बने, किन्तु मृत्यु महोत्सव बनना चाहिए। हमारा चिन्तन, मनन उन साधुओं की तरह निरंतर चलते रहना चाहिए जो सोते हुए भी जागृत भाव में रहते है अन्यथा हमारी स्थिति बस के उस कंडेक्टर की तरह हो जाएगी जिसने सफर तो बहुत किया किन्तु पहुँचा कहीं नहीं। आचार्यश्री ने कहा कि मृत्यु कभी चाहना से नहीं मिलती, उसका समय परमात्मा ने कब, कैसे आदि से निध र्धारित कर दिया है। अल्प जीवन में असफलताओं में भी सफलता के हेतु पहचान कर दीवार पर चढ़ने के प्रयास में बार-बार गिरती चींटी की तरह अपने लक्ष्य के प्रति समर्पित भाव से पुरुषार्थ करते हुए डिप्रेशन में जाने से बचना चाहिए। उन्होंने कहा कि एक ओर हम रिश्ते-नाते को महत्व देते हैं किन्तु वास्तविकता यह है कि हमारा शरीर भी हमारा नहीं हैं। जो हमसे जुड़ा है या जिसे हमने जोड़ लिया है वह वास्तव में हमारा नहीं है। हमारा शरीर तो आत्मा का आवरण है। परमात्मा प्राप्ति के लिए किया गया हमारा पुरूषार्थ मृत्यु को महोत्सव बनाता है। मन, वचन और कर्म की प्रवृत्तियां सदैव चलती रहती है किन्तु इन्हें सदमार्ग पर चलाने जप, तप और साधना की आवश्यकता होती है। हमें जीवन में सांसारिक क्रियाओं के चलते दृष्टि को सही रखना चाहिए, गलत दृष्टि अशांति पैदा करती है, उत्तेजना पैदा करती है जो पाप है। इस अवसर पर मुनि मयूखप्रभसागर, मुनि मीतप्रभसागर, साध्वी प्रियकल्पनाश्रीजी, साध्वी प्रियवर्षाजनाश्रीजी ने अपने भाव अभिव्यक्त किये। इस अवसर पर ललित कवाड, बंटी कवाड ने अपने भाव व्यक्त करते हुए सेलम संघ व कार्यकर्ताओं का आभार माना। समारोह में भाग लेने के लिये तिरपातूर, बैंगलोर, चेन्नई, ईरोड, तिरपूर, कोयम्बतूर, मदुराई, तिरूवन्नामल्लै, टिण्डीवनम्, मदुरान्तकम्, दिल्ली, जयपुर, बाडमेर, चांदवड, खापर, नंदुरबार आदि गांवों के श्रद्धालु बडी संख्या में उपस्थित हुए।

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