दुर्ग - साध्वी शुभंकरा श्री जी दुर्ग की इस पावन धरा में विगत कुछ दिनों से अपने ज्योतिर्मय प्रकाश से हम सभी बुद्धिजीबी मनुष्यों के मन में दिव्य प्रकाश को ज्योति प्रज्वलित करने का पवित्र पुरुषार्थ करते हुए निरन्तर संयम साधना के मार्ग पर चलते हुए हम सभी की मार्गदर्शक के रूप में यहां पर अपने दिव्य चरणकमल से दुर्ग नगर की पावन धरा को धन्य और गौरवान्वित किया है आपके सानिध्य में रहने का पुण्य अवसर हम सभी दुर्ग वासियों को प्रदान किया है।
परम पूज्य साध्वी के द्वारा संयम नियम का अनुसरण करते हुए आज 49 वर्ष पूर्ण कर 50 वें वर्ष में प्रवेश का पावन पवित्र पुरुषार्थ किया है, आपके द्वारा इस मार्ग पर चलना हम सभी बुद्धिजीवी मनुष्यों के लिए एक प्रेरणा है एक साधारण मनुष्य कैसे अपने स्वार्थसिद्धि पूरक जीवन को स्वंम के उत्थान एवम मानव कल्याण मार्ग पर चलते हुए जन जन तक संयमित जीवन जीने संयमित आचरण व्यवहार का पालन करते हुए अपने भाबी जीवन को आनादमय एवम् सुखमय बनाएं संसार के सभी मनुष्य के लिए सांसारिक भौतिकवादी जीवन के साथ साथ आध्यात्मिक उन्नति के शिखर पर पहुंचने का मार्ग संयम साधना उपासना आदि सभी द्वार हैं जिनके माध्यम से एक साधारण मनुष्य अपने सर्वोच्च स्थिति को उपलब्ध कर पाते हैं। साधना के मार्ग पर उपासना सबसे प्रथम सीढ़ी होती हैं जिसके बाद संयम पर परिपक्व होनी के बाद ही साधना का फूल खिलता हैं। साधना रूपी पुष्प खिलने के उपरांत ही मनुष्य अपने आत्मा से भेंट कर पता हैं तथा निरन्तर ध्यान अभ्यास से चिन्मयता को प्राप्त करता हैं जिसके दिव्यप्रकाश से धरती में एक शून्यता का आभास होता हैं ये शून्यता ही वह अनुभूति हैं जिससे कभी न समाप्त होने बाली आनंद का झरोखा खुल उठता हैं एक साधारण मनुष्य महावीर हो जाता हैं। धरती पर अवतार हो जाता हैं विश्व विजेता हो जाता हैं। जिनके उपस्थिति मात्र से मानव मन में विवेक का संचार होने लगता है ऐसे दिव्यता ईश्वरीय प्रकाशमय ज्योति को अनुभूति करवाती हैं। श्रेतांबर जैन बेत बस्त्रधारी सात्विक भोजन संयमित आचरण नियमित उपासना करने वाले बंधूजन सभी का हृदय पूजनीय साध्यी जी के आगमन से आनंदित हो गई है जिसकी मधुर ध्वनि नौले चितवन से गुजरने वाली हवाएं सुनाते हम सभी बंधूजनों के मन को छू कर गुजर रही हैं जिसे है बुद्धिजीवी मनुष्य महसूस कर रहें हैं।
एक परिचय साध्वी शुभंकरा श्री जी का
आपके संयमी जीवन से जुड़े कई रोचक ज्ञानवर्धक प्रेरणादाई हृदय स्मृति हृदय स्पर्शी संस्मरण जीवन में असाधारण बदलाव लाने का सशक्त मध्य बन सकता है साध्वी शुभंकरा श्री जी के जीवन से जुड़ी बातें आपके समझ रखने का एक छोटा सा प्रयास दीक्षा के पूर्व सांसारिक नाम संतोष मारोटि जिनके सांसारिक माता-पिता के रूप में कमला देवी सोनकरण जी मारोटि थे। जन्मदात्री मां की सद प्रेरणा से 5 वर्ष की उम्र में वैराग्य के भाव जागृत हुए पूर्व पुण्योदय से दादा रीधकरण सोनकरण मारोटि के सु संस्कारित परिवार में जन्म हुआ आदिनाथ भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस के दिन सन 1975 में संयमी जीवन धारण कर उसे अंगीकार किया छत्तीसगढ़ रन शिरोमणि परम पूज्य गुरुवर्या श्री मनोहर श्री जी गुरु के रूप मेरे जीवन को गड़ा और ज्ञान ध्यान त्याग तपस्या और स्पाट वक्ता के रूप में एक अलग पहचान दिलाई दोक्षा के पश्चात प्रातः एवं सायंकाल का प्रतिक्रमण जपणापूर्वक प्रतिलेखना प्रत्येक कार्य जपणापूर्वक करना आप की एक पहचान थी गुरु भगवंतो के श्री चरणों में अध्ययन करना और उनके प्रत्येक आदेश का प्रसनता पूर्वक स्वीकार करना आपके जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया था। छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश राजस्थान महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश गुजरात सौराष्ट्र आदि प्रदेशों में आपके गुणवाचक चातुर्मास संपत्र हुए, दीक्षा के पश्चात जीवन का प्रत्येक पल स्वर्णिम रहा गुरु महाराज की छत्रछाया का अद्भुत अलौकिक आनंद होता है गुरुवर्या श्री के चरणों के स्पर्श से आपके बाएं हाथ का अंगूठा जो ऑपरेशन के योग्य था वह एकदम ठीक हो गया ऐसे कई अनेक प्रसंग है जो हमारी स्मृति में ऑकत है दीक्षा के पश्चात गक्ष, मत, पंथ की कोई बात नहीं रही सभी साधु साध्वी जी के साथ अच्छे तालमेल के साथ जीवन के सभी स्वर्णिम पल बीते मेरे जीवन के आदर्श के रूप में मेरे जीवन के शिल्पकार पथ प्रदर्शक मेरे जीवन के आधार मेरी गुरबरिया परम पूज्य मनोहर श्री जी ने मुझे गड़ा उनके इस उपकार को इस जीवन में चुका पाना संभव ही नहीं है इस जीवन में एक पृष्ठ के उत्तर में उन्होंने कहा सदा दिवाली संत को बारह माह बसंत की संयम के पूर्व संयम की चर्चा होती थी लेकिन दीक्षा के बाद क्या कहूं जो आनंद है उसको अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती परिवार की ओर से दादाजी की धर्म के प्रति गहरी आस्था दादी मां की मीठी प्यार भरी डांट पिताश्री का अनुशासन मां का प्रतिपल वैराग्य संदेश भैया भाभी का प्यार और दुलार छोटी बहन की नटखता समाज में प्रत्येक सदस्यों की गहरी आत्मीयता ही मेरे संयमी जीवन का ठोस आधार है। आपके संयमी जीवन से जुड़े कई रोचक ज्ञानवर्धक प्रेरणादाई हृदयस्पर्शी संस्मरण जीवन में असाधारण बदलाव लाने का सशक्त मध्य बना साध्वी शुभंकरा श्री जी के जीवन से जुड़ी बातें आपके सम्मुख रखने का एक छोटा सा प्रयास है दीक्षा के पूर्व सांसारिक नाम संतोष मरोटी जिनके सांसारिक माता-पिता के रूप में कमला देवी सोनकरण जी मरोटी थे जन्मदात्री मां की सद प्रेरणा से 5 वर्ष की उम्र में वैराग्य के भाव जागृत हुऐ पुण्योदय से दादा रोधकरण सोनकरण मारोटि के सु संस्कारित परिवार में जन्म हुआ आदिनाथ भगवान के दीक्षा कल्याणक दिवस के दिन सन 1975 में संयमी जीवन धारण कर उसे अंगीकार किया छत्तीसगढ़ रत्न शिरोमणि परम पूज्य गुरुवर्या श्री मनोहर श्री जी गुरु के रूप मेरे जीवन को गड़ा और ज्ञान ध्यान त्याग तपस्या और स्पष्ट वक्ता के रूप में एक अलग पहचान दिलाई दीक्षा के पश्चात प्रातः एवं सायंकाल का प्रतिक्रमण जयणापूर्वक प्रतिलेखना प्रत्येक कार्य जयणापूर्वक करना आप की एक पहचान थी गुरु भगवंती के श्री चरणों में अध्ययन करना और उनके प्रत्येक आदेश का प्रसनता पूर्वक स्वीकार करना आपके जीवन का एक अनिवार्य अंग बन गया था। छत्तीसगढ़ मध्य प्रदेश राजस्थान महाराष्ट्र उत्तर प्रदेश गुजरात सौराष्ट्र आदि प्रदेशों में आपके गुणवाचक बातुर्मास संपन हुए दीक्षा के पश्चात जीवन का प्रत्येक पल स्वर्णिम रहा गुरु महाराज की छत्रछाया का अद्भुत अलौकिक आनंद होता है।
गुरुवर्या श्री के चरणों के स्पर्श से आपके बाएं हाथ का अंगूठा जो ऑपरेशन के योग्य था वह एकदम ठीक हो गया ऐसे कई अनेक प्रसंग है जो उनकी स्मृति में अंकित है दीक्षा के पश्चात गक्ष, मत, पंथ की कोई बात नहीं रही सभी साधु साध्वी जी के साथ अच्छे तालमेल के साथ जीवन के सभी स्वर्णिम पल बीते मेरे जीवन के आदर्श के रूप में मेरे जीवन के शिल्पकार पथ प्रदर्शक मेरे जीवन के आधार मेरी गुरबरिया परम पूज्य मनोहर श्री जी ने मुझे गड़ा उनके इस उपकार को इस जीवन में चुका पाना संभव ही नहीं है इस जीवन में एक पृष्ठ के उत्तर में उन्होंने कहा सदा दिवाली संत की बारह माह बसंत की संयम के पूर्व संयम की चर्चा होती थी लेकिन दीक्षा के बाद क्या कहूं जो आनंद है उसकी अभिव्यक्ति नहीं की जा सकती परिवार की ओर से दादाजी की धर्म के प्रति गहरी आस्था दादी मां की मीठी प्यार भरी डांट पिताश्री का अनुशासन मां का प्रतिफ्त वैराग्य संदेश भैया भाभी का प्यार और दुलार छोटी बहन की नटखट्ठा समाज में प्रत्येक सदस्यों की गहरी आत्मीयता हो मेरे संयमी जीवन का ठोस आधार है।
समाचार साभार - श्री नवीन संचेती, दुर्ग
17 Aug 2026