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जीवन में कभी भी मर्यादा का उल्लंघन नहीं करें - आचार्य जिनमणिप्रभसूरि

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शंखेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर व दादावाडी का प्रतिष्ठा महोत्सव।

हातकणंगले 24 अप्रेल - जीवन को उँचाईयों की ओर ले जाना है, तो हमें अनुशासन अपनाना होगा। अनुशासन की परिभाषा है- मर्यादा ! हर व्यक्ति को अपनी मर्यादा में जीना होता है। मर्यादा का जो भी उल्लंघन करता है, वह घोर अशांति का कारण बन जाता है। ये उद्गार संघवी माणकचंद अरूणकुमार विवेककुमार ललवानी परिवार द्वारा निर्मित माणिक सुशील विहार धाम परिसर में श्री शंखेश्वर पार्श्वनाथ मंदिर के प्रतिष्ठा महोत्सव में विशाल जन समूह को संबोध्रात करते हुए खरतरगच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने कहे।


उन्होंने कहा- दूसरों की जिन्दगी में झांकने की हमारी आदत है। अपनी जिन्दगी को देखने की हमें फुरसद नहीं है, जबकि दूसरों के जीवन की बारीकियों के प्रति हम बहुत उत्सुक होते हैं।

उन्होंने कहा- सामान्य-सी लगने वाली बात पर भी हम अपना ज्ञान भरा चिंतन प्रारंभ कर देते हैं।... इसने स्कूटर इस कंपनी का क्यों लिया! उस कंपनी का लेता तो अच्छा होता! ... हमेशा 9 बजे की बस पकड कर ऑफिस की ओर प्रस्थान करने वाला' यह' आज दस बजे क्यों जा रहा है? घर पर कुछ झघडा तो नहीं हुआ! यह पीले रंग का शर्ट इसे कुछ जंच नहीं रहा! लाल रंग का पहनता तो मजा आ जाता।


उन्होंने कहा- दूसरों के ढोल पर अपनी डांडी पीटने की यह आदत धीरे धीरे स्वभाव बन जाती है.... और यह स्वभाव हमारे वर्तमान और भविष्य को बरबाद कर देता है। हमें अपने जीवन से अधिक दूसरों की जिन्दगी में रस है। ऐसे व्यक्ति' ध्यान करने वाले' नहीं अपितु' ध्यान रखने वाले' होते

हैं। उन्होंने कहा- ऐसे लोग कचरा निकालने का काम करते हैं। पर अपना नहीं, दूसरों का! हर घर के बाहर हाथ में झाडू लिये खडे हो जाते हैं। यह विचार नहीं आता कि मैं अपने घर का कचरा कब साफ करूँगा! दूसरों के घर का कचरा निकालने से मुझे क्या मिलना है!

उन्होंने कहा- संसार में प्रतिक्षण परिवर्तन जारी है। मकान बदल गये... पहनावा बदल गया... रहने का ढंग बदल गया... यातायात के साधन बदल गये...! बस ! नहीं बदला तो हमारा स्वभाव! पहले भी दूसरों को पीडा देने में आनन्द आता था... आज भी आता है!

उन्होंने जोर देकर उदाहरण के साथ कहा- हमें अपने स्वभाव को बदलना है। थोडी गहराई से... थोडे अपनेपन से... अपनी जिन्दगी को देखना है... सजाना है... संवारना है। उन्होंने साध्वी मृगावती की कहानी सुनाकर श्रद्धालुओं को भाव विभोर कर दिया। उन्होंने कहा- साध्वी मृगावती ने अपनी गलती नहीं होने पर भी स्वीकार की। पश्चात्ताप किया, परिणाम स्वरूप केवल ज्ञान प्राप्त कर अपनी आत्मा का कल्याण कर लिया। उसने केवल अपना चिंतन किया।

आचार्यश्री ने शंखेश्वर तीर्थ की महिमा का वर्णन करते हुए कहा- यह प्रतिमा करोडों वर्ष प्राचीन है। इसे तीनों लोकों में पूजा गया है। देवी पद्मावती द्वारा यह प्रतिमा वासुदेवश्री कृष्ण को अर्पण की गई थी। इसी प्रतिमा के प्रक्षाल जल से जरा विद्या का प्रकोप समाप्त हुआ था।


आज अंजनशलाका प्रतिष्ठा के कार्यक्रम में जन्म बधाई, नामस्थापना, पाठशाला गमन, परमात्मा के विवाह, राज्याभिषेक एवं नवलोकान्तिक देवों द्वारा दीक्षा हेतु प्रार्थना के दृश्य व संवाद प्रस्तुत किये गये।

जन्म बधाई श्रवण कर सारी जनता हर्ष से नृत्य कर उठी।

आयोजक अरूणकुमार ललवानी ने बताया कि कल परमात्मा के दीक्षा कल्याणक का भव्य वरघोडा आयोजित होगा।

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