आरग, 4 मई - खरतरगच्छाधिपति गुरुदेव आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने आरग गांव में धूार्मसभा को संबोधित करते हुए कहा- हमें अपने भविष्य का निर्धारण करना है। अभी से अपने भविष्य की पोथी लिखना प्रारंभ करो। और हमारा भविष्य लिखने वाला और कोई व्यक्ति नहीं है। हम ही अपने आचरण और व्यवहार से अपना भविष्य लिखते हैं।
उन्होंने कहा- यह तो तय है कि हम यहाँ सदा नहीं रह सकते। हमें एक दिन यहाँ से जाना होगा। पर जाने से पहले जहाँ जाना है, उसका निर्णय कर लेना चाहिये। अपने वर्तमान की गतिविधियों की चर्चा करते हुए कहा-सुबह उठने के साथ तन, मन की सक्रियता प्रारंभ हो जाती है। हाथ काम करने लगते हैं... आँखें देखना प्रारंभ करती है... हृदय भावनाओं के प्रवाह में बहना प्रारंभ करता है.... दिमाग सोचना प्रारंभ करता है... मन निर्णय लेना शुरू करता है...। लेकिन ये समस्त क्रियाऐं संसार और परिवार से संबंधात होती है।
उन्होंने कहा-कभी मैंने अपने मन को अपने बारे में सोचने का निर्देश दिया! मैं अपने बारे में कब सोचूंगा! मुझे अपने भविष्य के बारे में सोचने का कोई अवकाश नहीं है। मैं अपने झूठे वर्तमान में इतना उलझ गया हूँकि मुझे अपने यथार्थ भविष्य के बारे में सोचने का समय नहीं है। यह तो तय है कि मेरा वर्तमान ही मेरे भविष्य का निर्माण करता है। पर यह वाक्य यदि मेरे रोम रोम में उतर गया होता तो मैं चिंतन की दिशा दूसरी करता। फिर मैं ऐसा नहीं सोचता कि जैसा मेरा वर्तमान होगा, वैसा मेरा भविष्य होगा।
तब मैं सोचता कि मुझे अपना भविष्य जैसा बनाना है, उसके अनुरूप मुझे अपने वर्तमान बनाना है। फिर मेरा वर्तमान भविष्य के लक्ष्य से बनेगा। तब मैं अपने वर्तमान के प्रति सावधान हो जाऊँगा क्योंकि मेरे दिमाग में भविष्य घूम रहा होगा। भविष्यलक्षी वर्तमान बनाना, जीवन जीने की कला है।
उन्होंने कहा- अनादिकाल से मैं पदार्थ और आसक्ति में भटकता आया हूँ, इसलिये संसार का परिभ्रमण है। अब मुझे सिद्धाचल मिला है... दादा आदिनाथ मिले हैं तो अब मुझे उनके साथ एकाकार हो जाना है।
उन्होंने कहा-जिन्दगी की यात्रा एकदम सीधी और सपाट नहीं है। कभी खुशी के फूल खिलते हैं तो कभी पीडा और आंसुओं के कांटें चुभते हैं। कभी सुखों की बारात सजती है तो कभी दुःखों की रात उतरती है। कभी आनंद की बहार है, तो कभी कष्टों की अश्रुधार है।
उन्होंने कहा- दोनों ही स्थितियों में समभाव में जीना, अपने स्वभाव की मस्ती में जीना ही जिन्दगी की खरी कसौटी है। इस कसौटी में जो खरा उतर जाता है, वह अपने लक्ष्य को पा लेता है, अपने साध्य को साध लेता है परन्तु जो इस जीवन की कसौटी में हार जाता है, वह इस अनमाल जीवन और जीवन की उर्जा को यूं ही नष्ट कर देता है। जो धीर वीर पुरूष स्थिति परिस्थति, वातावरण से प्रभावित हुए बिना बुलन्द हौंसलों के साथ आगे बढता है, वही अपनी मंजिल को प्राप्त करता है। मन ही हमारा मित्र है और मन ही हमारा शत्रु है। विवेक पूर्वक कार्य करने वाला मन हमारा परम सखा है। और स्वार्थ व अहंकार से लिप्त हमारा मन हमारा अपना सबसे बडा शत्रु है।
उन्होंने कहा- मन जब संसार और स्वार्थ से जुडता है तो नरक का निर्माण होता है । और मन जब विवेक व सन्मति से जुडता है तो स्वर्ग और मोक्ष का निर्माण होता है। विपरीत परिस्थितियों में हमारे विवेक की परीक्षा होती है।
उन्होंने कहा- अपने स्वार्थ के खातिर किसी व्यक्ति की कमजोरी व मजबूरी का फायदा उठाना बहुत बडा पाप है। मुकेश प्रजापत ने बताया-आचार्यश्री आज कर्णाटक में प्रवेश करके अथनी होते हुए ता. 9 मई को विजयपुर पहुँचेंगे। तीन दिवसीय प्रवास के पश्चात् वे सोलापुर की ओर विहार करेंगे। उनके साथ गणिवर्य मयंकप्रभसागर, मुनि विरक्तप्रभसागर, मुनि मुकुन्दप्रभसागर व मुनि महर्षिप्रभसागर विचरण कर रहे हैं।
17 Aug 2026