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भारतीय संस्कृति का रिवाज जोड़ना है तोड़ना नहीं - आचार्य जिनमणिप्रभसूरि

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होनवाड, 7 मई - आज यहाँ प्रवचन देते हुए गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने कहा कि स्नेह और स्वार्थ दो परस्पर विरोधाभासी भाव है। स्वार्थ जहाँ प्रेम संबंधों में विघटन पैदा करता है वहीं स्नेह स्वार्थ प्रवृत्तियों पर अंकुश लगाकर हमें दूसरों की पीड़ा दूर कर जीवन जीना सिखाता है। परिवार में जहाँ तीन पीढ़ियों एक साथ निवास करती है दूसरों के लिए अपनी इच्छाओं का त्यागकर ही शांति स्थापित की जा सकती है। शांति स्थापना के मूल में स्वार्थों का त्याग है। भारतीय संस्कृति की मूल भावना को व्यक्त करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि भारतीय संस्कृति महान् है। भारतीय संस्कृति का रिवाज जुड़ाव पैदा करना है, जोड़ना है, तोड़ना नहीं है यही कारण है कि सामूहिक परिवारों में आपसी सामंजस्य के चलते शांति स्थापित रह पाती है।

आचार्यश्री ने कहा कि जीवन में सकारात्मक सोच ही बड़ा बदलाव ला सकती है। सकारात्मक सोच रखकर जीवन जीना भी कला है। स्वार्थों का सहारा लेकर भी रक्त संबंध समाप्त नहीं किये जा सकते। हमें अपने जीवन और क्रियाकलापों को सुई और धागे की तरह दो कपड़ों को जोड़कर एक करने वाली प्रवृत्ति विकसित करनी चाहिए न कि कैंची की तरह कपड़े को कांटकर एक से दो करने वाली आदतें।

सामाजिक एवं पारिवारिक जीवन में अशांति पैदा करने वाले कारको की चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि स्वार्थ और अहंकार संबंधों में दरार पैदा करते है अतः इनसे सावधान रहकर इन्हें अपने मन और विचारों में स्थान देकर पालना नहीं चाहिए। ये हमें तात्कालिक आनन्द तो देते है किन्तु अशांति भी पैदा करते है। जीवन में कदम कदम पर फैले स्वार्थ और अहंकार के कांटों से सावधानी से ही बचा जा सकता है। बंटवारे का मूल भी स्वार्थ में ही निहित है। स्वार्थ हमारे अपनत्वभाव में बदलाव लाता है। ईर्ष्या बढ़ाता है और सम्बंधों को सिमट कर छोटा बनाता है। समाज में पारिवारिक दरार का बड़ा कारण स्वार्थ और अहंकार ही है जिसके प्रमाण स्वरूप समूह परिवार अब एकल परिवारों में परिवर्तित हो रहे है। आपसी विवादों का मूल कारण भी स्वार्थ और अहंकार ही है। अपनी गलती पर माफी मांगने में या छोटे होने से कोई प्रभाव नहीं पड़ता किन्तु इससे पारिवारिक शांति प्राप्त की जा सकती है, कलह से बचा जा सकता है।

पारिवारिक बंटवारे से उत्पन्न कलह और वंश नाश के संदर्भ में रामायण और महाभारत की कथाओं पर चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि रावण के वंश नाश का कारण जहाँ अहंकार है वहीं कौरवों के निहित स्वार्थ ने उस वंश को समूल उजाड़ दिया। आचार्यश्री ने इसे जीवन की विडंबना ही बताया कि निहित स्वार्थों के कारण हम अपने माता-पिता और भाइयों से अपनी रक्त संबंधों को भी भुला देते है। वास्तव में तो रक्त संबंध कभी समाप्त होते ही नहीं है। आचार्यश्री ने कहा कि संवाद से ही विवादों का अंत होता है। संवाद मन की कटुता को कम करता है, आक्रोश को कम करता है और मन की अशांति पर भी अंकुश लगाता है । उन्होंने बड़ों को बच्चों से जीवन सीख लेने की प्रेरणा देते हुए कहा कि क्षणिक आवेश को हमें बच्चों की तरह भूलकर स्नेह संबंधों के महत्व देकर शांति और आनन्द की अनूभूति करनी चाहिए। विनम्रता हमारे आचरण का ऐसा भाव है जो हमें शांति के पथ पर अग्रसित करता है और स्नेह संबंधों को दृढ़ बनाता है।

आचार्यश्री के दर्शनार्थ सोलापुर से भैरूलाल कोठारी, सचिन कोठारी, विजयपुर से मांगीलाल चौपडा, महावीर, रमेश आदि इचलकरंजी से जसराज छाजेड आदि श्रद्धालुओं का पदार्पण हुआ।

व्यवस्थापक मुकेश ने बताया कि आचार्यश्री ता. 9 को विजयपुर में प्रवेश करेंगे। जहाँ उनके सानिध्य में ता. 11 मई को नूतन जिनमंदिर व दादावाडी के निर्माण हेतु भूमि शुद्धिकरण का विधान होगा।

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