विजयपुर, 10 मई - जीवन का लक्ष्य परमात्मा की प्राप्ति राग द्वेश से मुक्ति, छलरहित व्यक्तित्व और वाणी में मधुरता का भाव रखे बिना संभव नहीं है। बाहर के कोलाहाल से मुक्त रहकर अंतर्मन में स्वयं को पहचानकर उत्कंठ भावों से अंतर्तत्व को पाने के लिए पुरूशार्थ आवष्यक है। हमें परमात्मा का प्रेम, उनका स्पर्ष और असीम षांति को पाने के लिए स्वयं के बांसुरीवत बनकर समर्पित होना पड़ेगा। आचार्यश्री ने कहा कि परमात्मा के अधरों का स्पर्ष पाने स्वयं को बांसुरी की तरह अपने आराध्य के प्रति समर्पित करना होगा।
आज आचार्यश्री का अपने शिष्य मंडल गणि मयंकप्रभ, विरक्तप्रभ मुकुन्दप्रभ महर्षिप्रभ के साथ नगर प्रवेश हुआ। उनका भव्य सामैया किया गया। गुरु गुण गीत द्वारा उनका स्वागत किया गया।
इस अवसर पर आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने कहा कि प्रभु प्राप्ति समर्पित भाव से ही संभव है। जीवन को बांसुरी की तरह तीन गुणों से युक्त करें, उसे गाँठ रहित कर मोह माया और ज्ञान के अहंकार की समाप्ति और वाणी की मधुरता से युक्त कर बांसुरीवत जीवन को प्रभु चरणों में समर्पित कर ही हम परमात्मा को पा सकते है।
बांसुरी के तीन गुणों में प्रमुख 'गाँठरहित' आकार की चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि राग, द्वेश, अषांति और अहंकार की गांठ हमें पाप की ओर ले जाती है। ऐसी गांठों से अपने दैनिक जीवन को मुक्ति देकर ही हम परमात्मा का सामीप्य पा सकते हैं उनका स्पर्ष पा सकते हैं। बांसुरी के अंतर्गत खालीपन" के दूसरे गुण की चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि आत्मकल्याण के लिए धर्मज्ञान आवष्यक है, जिज्ञासा से हम अपने अंतर्मन में ज्ञान का प्रकाष भरकर प्रभु प्राप्ति की दिषा में अग्रसर होते हैं। सरलता, सहजता और अज्ञानता का भाव हमें खालीपन का अहसास कराता हैं इसे जप, तप, साधना और जिज्ञासा से भरकर कर्मपरिणामों से बांसुरी की तरह आनन्द भाव का संचार कर स्वयं सहित अन्य को भी आनन्दित करेगी। बांसुरी के तीसरे भाव मधुरता" पर चर्चा करते हुए आचार्यश्री ने कहा कि हम जब भी बोले अंतर्मन से बोले सदैव मीठा बोले। वचनों में कटुता का भाव अंतर्मन में भी नहीं होना चाहिए। कटुता का भाव रखकर कुछ न बोलना मौन नहीं है। हमारे विचारों और अंतर्भावनाओं का प्रत्यक्ष प्रभाव हमारी आँखों और चेहरे पर उभरते हुए तनावों से प्रकट होता है। कटुता का त्याग मन, वचन और कर्म तीनों में समान रूप से होना आवष्यक है।
आचार्यश्री ने कहा कि हमें अपने जीवन को सार्थकता की ओर ले जाने और जीवन लक्ष्य को पाने के लिए अपने व्यक्ति को संवारना चाहिए। अपने व्यक्तित्व को हम कितना सुंदर बना पाएंगे यह हमारी अपनी जिम्मेदारी है। दैनिक जीवन में दूसरों को किसी भी रूप में पीड़ा न पहुंचाने का संस्कार विकसित कर हम स्वयं को और दूसरों को भी षांति अहसास करा सकते है। वचनों की मधुरता हमें न केवल एक-दूसरे से जोड़ती है अपितु आत्मषांति से हमें परिपूर्ण कर दूसरों को भी षांति प्रदान करती है जीवन सौन्दर्य का प्रसार संस्कारों के माध्यम से ही संभव हो कर प्रभावी बनता है।
17 Aug 2026