विजयपुर, 11 मई 2024 - परमात्मा की भक्ति तो बाद में होगी, पहले हमें परमात्मा के यथार्थ स्वरूप का परिचय प्राप्त करना चाहिये। पूर्ण परिचय प्राप्त किये बिना हमारे अन्तर में श्रद्धा का आविर्भाव नहीं हो सकता। और श्रद्धा के बिना भक्ति संभव नहीं है। बिना श्रद्धा की भक्ति मात्र औपचारिक बन कर रह जाती है। ये उद्गार आज यहाँ विमलनाथ जिनमंदिर व दादावाडी के भूमि शुद्धिकरण समारोह में विशाल सभा को संबोधित करते हुए गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने व्यक्त किये।
उन्होंने कहा- हम परम सौभाग्य शाली है कि हमें परमात्म तत्व को समझने की बुद्धि मिली है, अनुकूलता मिली है। परमात्मा के केवल बाह्य स्वरूप को ही नहीं समझना है, अपितु आन्तरिक स्वरूप का बोध प्राप्त करना है। क्योंकि वही यथार्थ है। परमात्मा के बाह्य स्वरूप में उनके बाह्य वैभव का वर्णन आता है। वे स्वर्ण, रजत, रत्न आदि बहुमूल्य पदार्थों से निर्मित समवशरण में बिराजमान होते हैं। उनका सिंहासन स्वर्ण हो होता है। वे जब विहार करते हैं तो देवता उनके पाँव रखने के लिये स्वर्ण कमल की रचना करते हैं। लाखों देव देवियाँ उनकी भक्ति करती है, चामर बींजा जाता है। उन्होंने कहा-इस बाह्य वैभव की महिमा को सुनना है, जानना है, पर उसी में रूक नहीं जाना है। यह वर्णन केवल जानने के लिये हैं। यही मात्र उनका असली परिचय नहीं है। उनका असली परिचय तो उनके गुण हैं। अनन्त ज्ञान, अनन्त दर्शन, अनन्त चारित्र, अनंत वीर्य, अनंत सुख ये सब उनका असली वैभव है। यह वैभव कभी कम ज्यादा नहीं होता। इस असली वैभव का परिचय यदि गहराई से किया जाय तो हमारे अन्तर में उसे प्राप्त करने का परम रूचि भाव जागृत होता है, वही श्रद्धा है, वही सम्यक्त्व है, वही सम्यक्दृष्टि है।
उन्होंने कहा- बेहोशी का इंजेक्शन लगने के बाद रोगी के शरीर में तीक्ष्ण शस्त्र के द्वारा डॉक्टर चीरफाड करता है, पर उस रोगी को जरा भी दर्द का अहसास नहीं होता, उसी प्रकार हमारी चेतना में मोह का इंजेक्शन लगा है, इस कारण हमें परमात्मा के यथार्थ स्वरूप का बोध नहीं होता।
उन्होंने कहा- परमात्मा के स्वरूप का बोध प्राप्त होने के बाद हमारे अन्तर में प्रेम का आविर्भाव होता है। यह प्रेम सांसारिक प्रेम से अलग है। संसार का प्रेम स्वार्थ, सौदा और अपेक्षाओं पर टिका है। हम प्रेम करते कम हैं, चाहते ज्यादा है। जहाँ अपेक्षा है, वह प्रेम कभी भी स्थायी नहीं हो सकता। कभी न कभी वह मिटेगा। क्योंकि अपेक्षा दोनों तरफ होती है। और पारस्परिक हर अपेक्षा पूरी नहीं की जा सकती।
उन्होंने कहा- परमात्मा का प्रेम दोनों तरफा है, पर अपेक्षा नहीं है। परमात्मा का प्रेम बिना किसी अपेक्षा के प्राणी मात्र के प्रति निरन्तर बह रहा है। आप भक्ति करो या न करो। परमात्मा के प्रेम में कोई कमी नहीं हो सकती।
उन्होंने कहा- प्रेम के बाद भक्ति का जन्म होता है। बिना प्रेम के भक्ति हो नहीं सकती। होगी तो अधूरी ही होगी। रोम रोम में प्रेम हो तो वह भक्ति पूर्ण होती है।
उन्होंने श्रेणिक राजा का उदाहरण देते हुए कहा- उनके हृदय में परमात्मा महावीर के प्रति जो अपार प्रेम और भक्ति थी, परिणाम स्वरूप स्वर्गवास के बाद जब उनका अग्नि संस्कार किया गया तो उनकी हड्डियों से महावीर महावीर की ध्वनि गूंजने लगी थी। आज यहाँ जिन मंदिर निर्माण हेतु भूमि शुद्धिकरण का विधान किया गया। श्री विमलनाथ कुशल जैन श्वे. मंदिर दादावाडी ट्रस्ट के तत्वावधान में आयोजित इस समारोह में शहर के अग्रगण्य लोग उपस्थित थे।
17 Aug 2026