विजयपुर, 12 मई 2024 - गच्छाधिपति आचार्य जिनमणिप्रभसूरि ने आज मदर्स डे के पावन अवसर पर विशाल सभा को संबोधित करते हुए कहा- मां के प्रेम और कर्त्तव्य की कोई व्याख्या नहीं हो सकती। जो लोग अपनी मां की सेवा नहीं करते, वे निश्चित ही दुर्गुणी व्यक्ति है। मां के उपकारों का बदला कभी भी चुकाया नहीं जा सकता। उन्होंने कहा- मैंने दीक्षा ली है, तो वह मां का ही उपकार है। आज संसार में स्वार्थ हावी हो गया है। कर्त्तव्य बुद्धि समाप्त हो गई है। जिस मां ने जन्म दिया... पाल पोस कर बडा किया, उनके प्रति अपने कर्त्तव्यों के प्रति हम लापरवाह हो रहे हैं। उन्होंने कहा- आज परिवार टूट रहे हैं! साथ जीने पर भी हम साथ नहीं जी पा रहे हैं। जहाँ हर व्यक्ति केवल अपनी इच्छाओं को ही महत्व देगा, वहाँ टकराव अनिवार्य है।
उन्होंने कहा- जिसने घर में जीना सीख लिया, उसका मंदिर जाना सार्थक हो जाता है। घर के तनाव को लेकर जो व्यक्ति परमात्मा के मंदिर में जायेगा, उसे मंदिर में परमात्मा के दर्शन कहाँ से हो पायेंगे।
उन्होंने कहा- जिस घर में बड़े बूढे माता पिता दर्द का अनुभव करते हों, वह घर संपन्न होने पर भी नरक जैसा है। माता पिता इस दुनिया के प्रत्यक्ष भगवान् है। पहले इनकी सेवा होगी तभी परमात्मा हम पर अनुग्रह करेंगे।
उन्होंने अपने बचपन की घटनाऐं सुनाते हुए कहा- जरा अपने बचपन को याद करना! याद नहीं आये तो घर के आंगन में खेलते किसी बच्चे को देखकर अपने साथ तुलना कर लेना कि माता पिता ने कितनी परेशानियाँ उठाकर तुम्हें पाल पोस कर बडा किया था। जब तुम्हें उनकी जरूरत थी, उंगली थामे रखी और जब वृद्धावस्था आने पर उन्हें तुम्हारी जरूरत पड़ी तो छोड कर चल दिये ! यह कैसी मानवता है, यह कैसा जैनत्व है।
उन्होंने कहा- बचपन में अपने माता पिता की अंगुली पकड कर चलना तभी सार्थक होगा जब उनके बूढे हो जाने पर तुम उनके हाथ की लाठी बनोगे। उन्होंने कहा- वे लोग भाग्यशाली हैं जो सुबह ही सुबह उठकर अपने माता पिता के चरणों में सिर झुका कर वंदना करते हैं, और उनका आशीर्वाद प्राप्त कर अपने जीवन को सफल बनाते हैं। वे लोग दुर्भाग्यशाली हैं, जिनके घरों में माता पिता होते हुए भी उनके आशीर्वाद को प्राप्त करने का भाव हृदय में नहीं उठता।
उन्होंने परमात्मा महावीर के जीवन की एक घटना का वर्णन करते हुए कहा-जब देवानंदा परमात्मा महावीर के समवशरण के पास से निकल रही थी, तो अचानक उसके मन में महावीर को निहारने का एक आकर्षण पैदा हुआ। वह महावीर को जानती नहीं थी, न धर्म को जानती थी! बस एक आकर्षण उसे खींचे ले जा रहा था। वह दौडती गई... सीढियाँ चढती गई। और परमात्मा महावीर के सामने खडी होकर एकटक उन्हें निहारने लगी। उसकी आँखों से जैसे अमृत छलकने लगा। गौतम स्वामी अचरज से भर उठे।
उनकी जिज्ञासा ने प्रश्न करने पर मजबूर कर दिया। परमात्मा से पूछा- भगवन्! आपकी आँखों से अमृत पान करने तो दुनिया आती है। यह बहिन कौन है, जो आप पर अमृत बरसा रही है। और न केवल अमृत बरस रहा है। बल्कि अचानक इसके स्तनों से दूध की धारा बहने लगी है। मुझे समाधान दीजिये।
परमात्मा महावीर ने कहा-गौतम ! यह मेरी मां है। मैं इसके गर्भ में 83 दिन रहा हूँ। मेरे निर्माण में इसका योगदान है। मां का वात्सल्य ही दूध बनकर बरस रहा है। उन्होंने कहा- घर में तनाव हो ही नहीं सकता, यदि पारस्परिक व्यवहार विवेक पूर्ण हों। यदि परिवार की शांति चाहिये तो आज से ही संकल्प कर लीजिये कि घर में माता पिता, दादा दादी जो भी बडे बुजुर्ग हैं, उन्हें सुबह उठकर नमस्कार करेंगे। एक नमस्कार सारे विवादों, तनावों को नष्ट कर डालता है।
इस अवसर पर मुनि विरक्तप्रभसागर ने जिन शासन की महिमा का वर्णन किया। सभा में गणि मयंकप्रभसागर, विरक्तप्रभसागर आदि तथा साध्वी वीरेशमालाश्रीजी आदि उपस्थित थे।
श्री विमलनाथ कुशल जैन श्वे. मंदिर दादावाडी ट्रस्ट के महावीर चौपडा ने बताया कि आचार्यश्री ने आज शाम सोलापुर की ओर विहार किया है। वे ता. 17 मई तक सोलापुर पहुँचेंगे। तीन दिवसीय स्थिरता वहाँ रहेगी। वहाँ से बारशी, बीड होते हुए जालना की ओर विहार करेंगे।
17 Aug 2026