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आवेश करना जीवन को हारना है - आचार्य जिनमणिप्रभसूरि

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अंबड, 3 जून - पूज्य खरतरगच्छाधिपति गुरुदेव श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म. ने आज वांचना में संबोधित करते हुए कहा-हमें सीखना है कि जो छोटा-सा जीवन मिला है, उसे हम सार्थक कैसे करें! हमारा वर्तमान का जीवन आवेश में पूरा हो जाता है। हम छोटी छोटी बातों के कारण बहुत जल्दी तीव्र आवेश में आ जाते हैं। यही आवेश हमारे पतन का कारण बन जाता है।

उन्होंने कहा- आवेश में आना बहुत आसान है। आवेश में निर्णय करना भी बहुत आसान है। और आवेश में किये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये और ज्यादा आवेश में आना भी बहुत आसान है। किन्तु यह स्थिति आदमी को बहुत नुकसान पहुँचाती है। क्योंकि आवेश का अर्थ होता है-किसी एक तरफ दिमाग का जड हो जाना! वह वही देखता है.. उसे उन क्षणों में और कुछ नजर नहीं आता । उसका दिमाग... उसके विचार.. बस ! एक ही दिशा में दौडते हैं। दांये बांये, आगे पीछे की दृष्टि को जैसे ताला लग गया हो!

उन्होंने कहा- वह एकांगी हो जाता है। और इस कारण उसका निर्णय सर्वांगीण नहीं हो पाता। उसका निर्णय मात्र उस समय की घटना या परिस्थिति पर ही आधारित होता है। वह उसके परिणाम के बारे में विचार नहीं करता। उसका निर्णय परिणामलक्षी नहीं होता।

उन्होंने कहा- मुश्किल यह है कि निर्णय तो तत्काल के आधार पर लेता है, पर उसका निर्णय उसके पूरे जीवन को प्रभावित करता है। एक बार निर्णय होने के बाद उससे पीछा छुडाना आसान नहीं होता।

उन्होंने कहा- शान्ति और आनंद का पहला सूत्र है-आवेश में मत आओ! लेकिन बहुत मुश्किल है इस सूत्र के आधार पर चलना। क्योंकि जीवन विभिन्न राहों से गुजरता है। बहुत मोड हैं इसमें! तब अपने आपको संभालना मुश्किल हो जाता है 1

उन्होंने कहा-तब दूसरे सूत्र का उपयोग करो-आवेश में आना पडे तो आओ, मगर उन क्षणों में कोई निर्णय मत लो! उन क्षणों का निर्णय निश्चित ही तुम्हारे जीवन रस धार में जहर भरने का काम करेगा। वह जिन्दगी भर की कमाई को पल भर में साफ कर देगा। इसलिये यदि शांति चाहते हो तो आवेश के क्षणों में निर्णय लेना टालो। लेकिन मन को समझाना बहुत मुश्किल है। शांति की स्थिति में निर्णय लेने में अत्यन्त आलसी होता है। परन्तु आवेश के क्षणों में जल्दबाजी करता है।

उन्होंने कहा-तब तीसरे सूत्र का उपयोग करो-आवेश में लिये गये निर्णय को कभी भी क्रियान्वित मत करो! उसे रोक दो। मन को थोडा सोचने का मौका दो! थोडा उसे धीरज मिलने दो! तब निर्णय पर मन अपने आप पुनर्विचार करेगा और तब पायेगा कि अच्छा हुआ जो निर्णय को स्वर नहीं दिया अन्यथा बहुत अनर्थ हो जाता। हाँलाकि मन आवेश के क्षणों में लिये गये निर्णय को क्रियान्वित करने के लिये बहुत उतावला हो जाता है। वह एक क्षण भी रूकना नहीं चाहता। वह न पीछे मुडकर देखना चाहता है... न आगे की रोशनी उसे नजर आती है।

उन्होंने कहा- उन क्षणों में अपने चित्त को समझाना है। जो व्यक्ति आवेश के क्षणों में कुछ पलों के लिये भी संभल जाता है, वह अपने जीवन की तस्वीर में मोहक रंग भर लेता है।

उन्होंने परमात्मा महावीर और चण्डकौशिक सर्प का उदाहरण देते हुए कहा- चण्डकौशिक ने परमात्मा को डंसा, पर परमात्मा ने उसे करुणा का अमृत पिलाया। शास्त्रकार फरमाते हैं- प्रभु महावीर चण्डकौशिक को शाता और समाधि देने के लिये पूरे पन्द्रह दिन वहाँ जंगल में रहे, ताकि चण्डकौशिक की गति सुधर जाये।

आज जालना की ओर विहार करते हुए आचार्यश्री अपने शिष्य मंडल के साथ अंबड पधारे। श्री वासुपूज्य जिन मंदिर के दर्शन कर स्कूल में बिराजे।

वेता. 5 जून को जालना में प्रवेश करेंगे। वहाँ जीर्णोद्धार कृत दादावाडी की प्रतिष्ठा 12 जून को उनकी निश्रा में होगी।

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