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✍️✍️ "क्षमा पर्व – पर्युषण पर्व" ✍️✍️

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रायपुर - पर्युषण पर्व विश्व का पूरा जैन धर्म चाहे श्वेताम्बर हो चाहे दिगम्बर महापर्व के रूप मे मनाता है। यह आत्मदीप को जलाने का अनुष्ठान्न है। यह उत्सव आत्मशुद्धि एवं विशिष्ट विषयों के आधार पर मनाया जाता है। वर्तमान मे हिंसा, वैमनस्य,भोग विलास व सुविधावाद के माहौल में “क्षमा” चमत्कार एवं आश्चर्यजनक है। जैन धर्म की त्यागप्रधान संस्कृति मे पर्युषण पर्व का अपना विशिष्ट आध्यात्मिक महत्व है। यह स्वयं की आत्मशुद्धि का प्रेरक पर्व है इसलिए यह पर्व नहीं महापर्व है। पर्युषण पर्व "जप, तप, साधना, आराधना, अनुप्रेक्ष" आदि अनेक प्रकार के अनुष्ठानों का अवसर है। यह पर्व जैन एकता का पर्व है। सम्पूर्ण जैन समाज इस अवसर पर जागरूक एवं साधना मे रत हो जाता है।यह पर्व व्यक्ति को ऊंचाइयों की ओर ले जाता है। परंतु कब? जब व्यक्ति के भीतर से आवाज उठती है कि मुझे जीवन मे कुछ परिवर्तन करना है। पर्युषण पर्व नहीं अपितु परिवर्तन का प्रयोग है। आत्म दर्पण मे अपने आपको देखने का पर्व है। यह पर्व दूसरों की प्रवृत्तियों को नहीं स्वयं की समीक्षा का पर्व है। अपनी वृत्तियों का निरीक्षण का पर्व है। "दिगम्बर परंपरा मे इसे दसलाक्षणिक पर्व" के रूप मे मनाते हैं। इसमें भादों शुक्ल पंचमी से चतुर्दशी तक सम्पन्न होता है। दूसरी तरफ "श्वेताम्बर परंपरा" मे भाद्रपद शुक्ल पंचमी का दिन समाधि का दिन होता है। जिसे "संवत्सरी" के रूप मे पूर्ण त्याग – प्रत्याख्यान, उपवास, पौषध सामायिक, स्वाध्याय और संयम से मनाया जाता है। वर्षभर मे कभी समय नहीं निकाल पाने वाले लोग भी इस दिन जागृत हो जाते हैं। कभी उपवास नहीं करने वाले भी इस दिन धर्मानुष्ठान्न करते नजर आते हैं। यह पर्व "विघटन नहीं सामंजस्य" का संदेश देता है। यह आत्मा को पहचानने का पर्व है। आत्मचिंतन से व्यक्ति को अपनी गलतियों और विकारों को समझने मे मदद मिलती है। उसमे सहिष्णुता भाव का विकास होता है। और धीरे धीरे यहां का नाश होता है। पर्युषण कषाय शमन की प्रेरणा देता है, क्योंकि कषाय व्यक्ति का स्वभाव नहीं विभाव है जो आत्मा को विकृत कर अपने लक्ष्य तक पहुँचने से रोकता है। इसलिए इस पर्व पर मन को इतना निर्मल बनाएं कि कभी भी वह कषायरूपी रज को स्पर्श नया कर पाएं। हम अपनी निर्मल भावना से कषाय का क्षय करें। पर्युषण पर्व पर हम केवल बाह्य संयम ही नहीं अपितु कषाय का संयम, इंद्रीय संयम, राग द्वेष का संयम करना भी सीखें। यह संयम यात्रा इतना प्रगाढ़ हो जाए कि हर वर्ष संयम कि यात्रा चरेवेती कि तरह चलती रहे और मंजिल तक पहुंचकर अनंत मे डूब जाए। भारतीय संस्कृति मे अनेक पर्व त्योहार मनाए जाते है। परंतु जैन धर्म का यह आध्यात्मिक महापर्व आमोद- प्रमोद ,रंग बिरंगे वस्त्र पहनने का और पकवान मिष्ठान्न खाने का पर्व नहीं है। इस महापर्व का उद्देश्य आत्मविशुद्धि है। यह जीवन, त्याग और आत्मचेतना को विकसित करने का महान अवसर होता है। यह पर्व आत्मा को परमात्मा बनाने का राग पर वीतराग की विजय का,अंधकार से प्रकाश की ओर बढ़ने का महापर्व है। पर्युषण पर्व क्षमा का आदान प्रदान का पर्व है, ग्रन्थि विमोचन का अवसर है। यह मैत्री पाठ पढ़ने पढ़ाने का पर्व है। क्षमा वीरों का भूषण है। कायर क्या क्षमा करेंगे। क्षमा सबको सुख आनंद देती है। क्षमा करना अहिंसा है। क्षमा मन से मांगा जाए और दिया जाए। मनसा-वाचा–कर्मणा-क्षमा। सब जीवों को क्षमा। सभी को क्षमा।

प्रस्तुति - ज्योति हरख जैन, जिला-, जिला- धमतरी (छग)

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