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वेग, उद्वेग, आवेग से बचे। सम्वेग और निर्वेग से अपना जीवन यापन करें। - आचार्य श्री विद्यासागर महाराज

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डोंगरगढ़ – संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ चंद्रगिरी डोंगरगढ़ में विराजमान है। आज के प्रवचन में आचार्य श्री ने कहा की तीर्थंकर जितने भी होते हैं वे सारे – सारे अपढ़ होते है। उनकी पढाई कहीं भी नहीं होती और आगे भी ऐसा ही रिकार्ड रहेगा। आप लोग पढ़े लिखे हो, जिसको कुछ समझ नहीं आता उसके लिये विद्यालय है। वे अपढ़ होकर भी अच्छे – अच्छे उलझन, समस्याओं का भी समाधान दे देते है। ये युग एक प्रकार से वैज्ञानिक युग माना जाता है इसी के मापदंड से किसी कि पहचान निर्धारित किया जाता है। स्वर्ग में भी सुनने को नहीं मिलता कि कोई देव पाठशाला या विद्यालय जाता हो वहाँ यह सुनने को जरुर मिलता है कि वो गुरु कहलाते हैं जिसे बृहस्पति कहते हैं। उन्होंने स्वर्ग में विद्यालय कि स्थापना नहीं कि, इतना अवश्य है कि उनको विशेष क्षयोपषम रहता होगा, इसलिए उनको बृहस्पति कहकर पुकारते हैं और कहीं – कहीं पर कवि लोग काव्यों में बृहस्पति का नाम याद करते हैं। हे भगवान आपके गुणानुवाद करने में अक्षमता हो गयी। याने वह बृहस्पति भी चाहे तो वह भगवान का गुणानुवाद पूर्ण नहीं कर सकता। ऐसा आपका व्यक्तित्व है फिर भी आप पढ़े लिखे नहीं हो। हां समझ में नहीं आता ऐसा नहीं, समझते नहीं इसलिए विद्यालय खोलकर उनको समझाया जाता है। समझाने के बाद भी यदि उनको समझ नहीं आता है तो वह हम – तुम आदि में समावेश हो जाते हैं। आप अपने आपको पढ़े लिखे मत समझो। एक हाइको लिखा था कि – “किसी वेग में, अपढ़ हो या पढ़े, दोनों समान है” अनपढ़ को भी हम उसी श्रेणी में रख सकते हैं, पढ़े लिखे होने के बाद भी माता पिता कि कोई बात सुनते नहीं है क्योंकि वे वेग में है, बहुत वेग में है। माता पिता सोचते हैं कुछ कहो नहीं, नहीं तो कही चला न जाये। इतने वेग में जैसे कुछ गाड़ी कुछ स्टेशन में रूकती नहीं है और स्टेशन से गाडी बहुत वेग से निकल जाती है क्योंकि वहाँ सिग्नल कि सेटिंग ऐसी होती है। वेग, उद्वेग, आवेग के विपरीत वह अपढ़ है और जिसके पास सम्वेग और निर्वेग है वह सम्वेग और निर्वेग के माध्यम से दूसरे को शांत कर सकता है किन्तु उद्वेग के माध्यम से शांत को भी अशांत किया जा सकता है। आप कौन सा कार्य कर रहे हो बताओ। ध्यान रखो जब माथा तपता है गरम होता है तो उसको सम्वेग वाला व्यक्ति ही शांत बिठा सकता है। भगवान के समवशरण में सिंह और गईया साथ में बैठते है। गईया को देखकर सिंह खाने का भाव नहीं करता है तो गईया भी सिंह को देखती है कि हम दोनों समान है। जहाँ राजा और प्रजा दोनों एक हो जाते है उसका नाम समवशरण है। हमें कुछ करना नहीं ज्यादा कुछ पढाई करना नहीं, वेग को देखते रहो। ड्राईवर गाडी को चलाता है स्वयं तो बैठा रहता है। वेग को सम्हाल के गाडी चलाता है क्योंकि सैकड़ों, हजारों लोग उस पर भरोसा, विश्वास करके गाडी में बैठे है तो वह भी जागृत होकर गाडी चलाता है। हमें जाग्रति कि आवश्यकता है पढ़ लिखकर के बैठने कि नहीं काम करने कि आवश्यकता है। शांत रहने कि आवश्यकता है। इसलिए जगत का यह स्वभाव है कि वह ज्ञान हमारे पास स्वभाव के रूप में है न ही उसमे वैराग्य उठ रहा है। विद्यालयों के माध्यम से उसमे आवेग, उद्वेग आदि कि क्षमता आ जाती है किन्तु आत्मा का स्वभाव क्या है इसके बारे में एक सेकंड भी खर्च नहीं करते आप लोग और हमारे पास आकर कहते हो कि महाराज शांति दे दो, शांति से बैठ जाओ तो शांति मिल जाएगी। आज सीटिंग का इतना महत्त्व नहीं है जितना कि भागम - भाग का है। उसको हम समझ भी नहीं सकते जो शांत बैठता है उसको तात्कालिक उसका अनुभव होने लग जाता है। वैराग्य में कभी खदबद – खदबद नहीं होता, आवेग में वो कभी शांत बैठ ही नहीं सकता, उछलता रहता है। आज कि विद्या उछाल सिखाती है। उछाल होना तो चाहिये लेकिन एक पढ़ा लिखा होने के बाद भी आवेग में आ जाता है और जो अपढ़ है वह सम्वेग कि तरफ आ जाता है और मिथ्यात्व को मिटाते हुए सम्यक दर्शन को और घना – घना बनाता जाता है, आस्था को और मजबूत बनाते चला जाता है। तीर्थंकर और उनकी संतान विद्यालय नहीं जाती है यदि जाती भी है तो उन्हें क्षत्रियता आदि का पाठ दिया जाता है। यदि व्यक्ति अशांत होकर के शांत को भी अशांत बना रहा है तो उसके लिये क्षत्रियता काम करती है। तलवार इसलिए रखी है कि तुम्हारी उछल कूद शांत हो जाये। आज छुप-छुप कर छापा मारा जाता है। रेड है वो वाइट नहीं है, जितना रेड रखे हो उसे निकाल दो नहीं तो रेड हो जाओगे। पहले नियम दिलवाते थे कि व्यापारी मौलिक – मौलिक जो वस्तु है उसे राज कोष में देगा। जब व्यापारी बाहर से व्यापार करके आता था तो सारी कमाई राजा को दिखता था और जो विशेष वस्तु होती थी उसे राजा को दे देता था। राजा जो हीरा मोती पहनता था वह अलग होते थे और जो राज कोष में होता था वह अलग रहता था और उसकी चाबी राजा के पास नहीं होती थी। राजा पढ़ा लिखा नहीं भी होता था तो उसे कभी न्यायालय में जाने कि आवश्यकता नहीं होती थी। वह क्षत्रियता को नहीं छोड़ता था। बनिया लोग क्षत्रियता को नहीं जानते। सीधे धन न मिले तो तौलने में डंडी मारते हो। सम्यक दर्शन कि प्राप्ति के लिये सम्वेग, निर्वेग कि आवश्यकता है, शांत बैठने कि आवश्यकता है जिससे विशुद्धि लब्धि प्राप्त हो जाती है और विशुद्धि लब्धि के बिना सम्यक दर्शन कि भूमिका बनती नहीं है इसलिए चुप बैठो। चुप बैठने से ही कौन किसका अधिकारी, भोक्ता है पता चलता है। बच्चे को भोजन धीरे – धीरे कराओ। दांत का काम आंत को मत दो नहीं तो दांत गिर जायेंगे| यदि पढ़ा लिखा भी आवेग में आ रहा है तो उसकी संगती अच्छी नहीं है। आर्य के साथ संगती रखो। आवेग वाले के साथ संगती मत रखो उससे भला होने वाला नहीं है। आज संगती अच्छी मिलती नहीं है इसलिए युवा पीढ़ी आवेग में रहती है और माता पिता शांत बैठे है। स्वर्गों में भी विशुद्धि ऐसे ऊपर – ऊपर बनी रहती है इसलिए उनको पाठशाला कि कोई आवश्यकता नहीं होती। पढ़े लिखे होने के बाद भी इधर उधर कि बात करते हैं और आवेग में आ जाते हैं। इसलिए जो व्रती बने हैं वह शांति के साथ रहे तो उसका चरित्र ज्यों का त्यों बना रहता है। जो शांत बैठा है उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त हो सकता है और जो वेग में है उसे सम्यग्दर्शन प्राप्त नहीं हो सकता। गुरु जी कहते थे कि “बहुत पढना नहीं, बहुत बार पढो” इसका अर्थ मै यह समझता हूँ द्वादशांग बार – बार है किन्तु द्वादशांग को बहुत बार पढो तो णमोकार मन्त्र भी पर्याप्त है। इसलिए आप लोग वेग, उद्वेग, आवेग से बचे और सम्वेग और निर्वेग से अपना जीवन यापन करें। आज आचार्य श्री को नवधा भक्ति पूर्वक आहार कराने का सौभाग्य श्रीमती सुनीता जैन, संचिता जैन, श्री निर्मल जैन, श्री आकाश जैन, श्री संचित जैन परिवार डोंगरगढ़ छत्तीसगढ़ निवासी को प्राप्त हुआ जिसके लिए चंद्रगिरी ट्रस्ट के अध्यक्ष सेठ सिंघई किशोर जैन, कोषाध्यक्ष सिंघई सुभाष चन्द जैन, महामंत्री श्री निर्मल जैन, मंत्री श्री चंद्रकांत जैन, कार्यकारी अध्यक्ष श्री विनोद बडजात्या, प्रतिभास्थली के अध्यक्ष श्री प्रकाश जैन (पप्पू भैया), श्री सप्रेम जैन (संयुक्त मंत्री) ने बहुत बहुत बधाई और शुभकामनायें दी चंद्रगिरी ट्रस्ट के अध्यक्ष ने बताया कि आचार्य श्री ससंघ के सानिध्य में दिनांक 1 जनवरी 2024 को प्रातः 8 बजे १००८ श्री चन्द्र प्रभ भगवान का महा मस्तिकाभिषेक, शांति धारा, पूजन, प्रवचन आदि होगा। संत शिरोमणि 108 आचार्य श्री विद्यासागर महाराज ससंघ के दर्शन के लिये उनके भक्त सम्पूर्ण भारत से एवं विदेशों से भी आ रहे है, ज्यादातर छत्तीसगढ़, मध्य प्रदेश, महाराष्ट्र, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, दिल्ली, इम्फाल, यु.एस.ए. आदि जगहों से आ रहे है। यहाँ आने वाले भक्तों कि समुचित (आवास, भोजन आदि) व्यवस्था ट्रस्ट द्वारा कि गयी है। उक्त जानकारी चंद्रगिरी डोंगरगढ़ के ट्रस्टी निशांत जैन (निशु) ने दी है।

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