नागपुर - श्री दिगंबर जैन परिवार मंदिर ट्रस्ट के प्रांगण में आयोजित धर्मसभा में संत शिरोमणि, मोक्षमार्ग प्रकाशक परम पूज्य आचार्य गुरुवर समयसागर जी महाराज ने अपने प्रवचन में गहन आध्यात्मिक रहस्यों को सरल एवं प्रभावशाली उदाहरणों के माध्यम से प्रस्तुत किया। उन्होंने कहा कि केवल शब्दों का ज्ञान वास्तविक ज्ञान नहीं होता, बल्कि वही शब्द कभी-कभी ज्ञानवान को भी विचलित कर देते हैं।

प्रवचन के दौरान आचार्य श्री ने श्रोताओं से प्रश्न किया— आपको शुक्लवर्ण पसंद है या कृष्णवर्ण? सभा में किसी ने उत्तर दिया कि उसे शुक्लवर्ण पसंद है, किसी ने कहा कि कृष्णवर्ण पसंद है। गुरुदेव ने हास्य रूप में कहा— “आप तो यह भी कह सकते हो, दांतों के लिए शुक्लवर्ण और बालों के लिए कृष्णवर्ण—अर्थात दांत सफेद और बाल काले चाहिए।” इस उदाहरण के माध्यम से उन्होंने बताया कि संसार की पसंद-नापसंद सापेक्ष दृष्टि पर आधारित होती है।
आचार्य गुरुवर ने कहा कि अनादि काल से अनंत जीव मोक्ष को प्राप्त हो चुके हैं। कौन पहले मुक्त हुआ और कौन बाद में— यह केवल काल की अपेक्षा से विचारणीय हो सकता है, किंतु अंतरंग गुणों की दृष्टि से सभी सिद्ध आत्माएं समान हैं।
उन्होंने बताया कि संसार में तुलना का भाव ही दुःख का मूल कारण है। जैसे शिक्षा में कोई पहली कक्षा में, कोई पाँचवीं में और कोई नर्सरी में होता है— उसी प्रकार आध्यात्मिक स्तर भी भिन्न होते हैं। नर्सरी का बालक सौ में सौ अंक प्राप्त कर सकता है, किंतु वह उच्च ज्ञान से अभी दूर होता है। अतः तुलना से प्रयोजन सिद्ध नहीं होता, बल्कि मन में असंतोष उत्पन्न होता है।
आचार्य श्री ने कहा—
“संसारी प्राणी एक-दूसरे से तुलना कर अपने आपको सापेक्ष सुखी मानकर आनंदित होता है, पर वह वास्तविक सुख नहीं, केवल सुखाभास होता है। जबकि सिद्धशिलागामी आत्माएं इन सुखाभासों से परे होकर निरपेक्ष भाव में स्थित रहती हैं और चिरकाल तक अनंत सुख का अनुभव करती हैं।”
सांसारिक सुख पर प्रकाश डालते हुए उन्होंने कहा कि लखपति, हज़ारपति की तुलना में अपने आपको अधिक सुखी मानता है; करोड़पति, लखपति की तुलना में। इसी प्रकार सौधर्म इंद्र अन्य देवों की तुलना में अपने आपको अधिक सुखी मानते हैं। बड़ी सभाओं में सामान्य अतिथि, मुख्य अतिथि की तुलना में अपने आपको कम और मुख्य अतिथि स्वयं को अधिक सुखी अनुभव करता है। यह सब केवल सुखाभास है, वास्तविक सुख नहीं।
इन्द्रिय संयम पर विशेष बल देते हुए आचार्य गुरुवर ने कहा—
“शब्दों की भी स्मृतियाँ होती हैं—मधुर, कटु और कठोर। जब ये शब्द कर्णेन्द्रियों के माध्यम से भीतर पहुँचते हैं, तो वही स्मृतियाँ जागृत हो जाती हैं और जैसी स्मृति होती है, वैसा ही परिणाम तत्काल प्रकट होता है। किंतु यह कर्णेन्द्रिय की विजय नहीं, पराजय है। सच्ची विजय तो तब है, जब शब्दों की स्मृतियों को जानते हुए भी साधक शांत भाव की स्थिति को स्वीकार करे—यही कर्णेन्द्रियों पर वास्तविक विजय है।”
उन्होंने आगे कहा कि शब्द, रूप, रस, गंध और स्पर्श— ये सभी इन्द्रियों के विषय हैं, जो आत्मा को बाँधते हैं। शब्द स्वयं ज्ञान नहीं है, किंतु वह ज्ञानवान को भी नचा सकता है। आलोचना और प्रशंसा दोनों ही मोह को बढ़ाने वाली प्रवृत्तियाँ हैं।
उन्होंने कहा कि यदि आलोचना सुनकर मन में प्रतिक्रिया उत्पन्न होती है, तो इसका अर्थ है कि अभी कर्णेन्द्रिय पर विजय नहीं हुई है। साधक को पंचेन्द्रियों के विषयों से ऊपर उठना आवश्यक है। अंत में उन्होंने कहा कि भिन्न-भिन्न इन्द्रियों के विषयों से ऊपर उठना ही वास्तविक मोक्षमार्ग है।
यह जानकारी प्रचार-प्रसार प्रमुख सुमत लल्ला तथा डॉ. अनीश जैन द्वारा प्राप्त हुई। श्री दिगंबर जैन परिवार मंदिर ट्रस्ट के प्रांगण में गुरुदेव के प्रवचन सतत जारी हैं। ट्रस्ट के अध्यक्ष आनंद जैन एवं मंत्री आशीष जैन ने सभी श्रद्धालुओं से इन प्रवचनों का अधिक से अधिक लाभ लेने का आह्वान किया है। प्रवचन का समय प्रतिदिन प्रातः 8:15 बजे से निर्धारित है।