सरदारपुरा (सोजत) 26अप्रैल 2026 - परम श्रद्धेय, प्रज्ञानिधी आचार्य भगवन पूज्य श्री विजयराज जी म. सा. के सानिध्य में दिवंगता संधारा साधिका, महाश्रमणिरत्ना, परम विदुषी महा सती श्री प्रभावती जी म.सा. की गुणानुवाद सभा का आयोजन हुआ उसमें पूज्य आचार्य भगवन् ने उनके वैराग्य काल से अब तक जीवन वृतांतों का उल्लेख करते हुए फरमाया-

महासति जी, सरल, विनम्र, मृदुल और निर्मल भावों की साध्वीरत्ना थी, एवं 9-10 वर्ष की उम्र में उनके भीतर वैराग्य का बीज अंकुरित हुआ- उन्होंने अपने माता-पिता और भाई के साथ समता विभूति आचार्य श्री नानेश के श्री मुख से १५ फरवरी सन् १९७३ के शुभ दिन गंगाशहर-भीनासर स्थित जवाहर विद्यापीठ में तकरीबन तीस हजार लोगों की जन भेदीनि उपस्थिति के बीच १२ मुमुक्षुओं के साथ जैन भागवती दीक्षा अंगीकार की।
दीक्षित होने के बाद साध्वी जीवन में आगम अध्ययन, सेवा, स्वाध्याय और धर्म आराधन में अपने आपको समर्पित कर दिया। आपने जैन सिद्धांत रत्नाकर की धार्मिक परीक्षाएं वरीयता के साथ उत्तीर्ण की। बचपन से अल्पभाषी, मृदुभाषी, सकारात्मक सोच और अप्रमत्त जीवन की धनी रही। लगभग ५४ वर्षों का उनका संयम जीवन रहा। इसमें आपने लगभग ७५ हजार किलो मीटर की पदयात्रा से भारत के दूर सदूर प्रांतों में विचरण करके धर्म साधना एवं जिन शासन की महत्ती प्रभावना की।
स्वभाव से सौम्य, वाणी से मधुर, अनुशासन बद्ध जीवन चर्या में आपकी अंतरंग खासियत थी। आपके विद्वत्ताभरे जीवन से प्रभावित होकर आचार्यश्री नानेश के समय से आप परम विदुषी' विशेषण से अलंकृत की गई,बाद में शांत क्रांति संघ में महा स्थिवर श्रमण श्रेष्ठ गणाधिपति श्री शांति मुनि जी म.सा. ने आपको शांत क्रांति संघ की महाश्रमणिरत्ना का विशेषण प्रदान किया। आप विनम्रता की प्रतिमूर्ति थी, संयम साधना में हर समय सजग रहती थी, आपकी सरलता, सादगी, संयम प्रियता के सभी कायल थे। वर्षों तक महाश्रमणिरत्ना श्री प्रभावती जी म. सा. ने जिनशासन की भव्य प्रभावना की।
हरियाणा, दिल्ली, राजस्थान, मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, कर्नाटक, तमिलनाडू, छत्तीसगढ़ और उडीसा में आपके यशस्वी चातुर्मास हुए, हजारों-लाखों लोगों ने आप से धर्म प्रेरणा प्राप्त की, कई अजैन जैन बने, कई जैन, स्वाध्यायी बने। आपकी प्रभावी प्रेरणा पाकर ही छत्तीसगढ़ की एक साहू परिवार की पढ़ी लिखी युवती ने सांसारिक जीवन का परित्याग कर कठोर साधुजीवनचर्या को अंगीकार किया। वे आज तपस्विनी महासती श्री महक प्रभाजी के नाम से जिन शासन की प्रभावना कर रही है। जिन्होंने सन् २०२५ के जयपुर चातुर्मास में आपके सानिध्य और प्रेरणा से मासखामन की तपस्या करके नया कीर्तिमान स्थापित किया। ऐसे कई जैन संभ्रांत परिवार की लड़कियां महासति जी के सम्पर्क, सानिध्य से धर्म साधना के पथ पर गतिशील हुई है। विगत कुछ अरसे से आप कैंसर जैसी महा व्याधि से रुग्ण थी , इस महाव्याधि में भी आपकी समता-सहनशीलता और सम्भाव गजब का था, चेहरे पर वो ही प्रसन्नता, चिंतन में वो ही सकारात्मकता और चर्या में वही सजगता देख कर सभी प्रमुदित व प्रभावित होते थे। कालचक्र और कर्मचक्र से कोई अछूता नहीं रहता, दिनांक २४ अप्रैल की रात्रि में चौवीहार संधारे के साथ महाश्रमणी जी ने तिलकनगर जयपुर स्थित नवकार भवन में नवकार महामंत्र के जाप के साथ विदाई ली, आपके वियोग से साध्वी संघ में अपूरणीय क्षति हुई है जिसे जल्दी से भरा नहीं जा सकता।
इस अवसर पर ब्यावर संघ के अध्यक्ष श्री मान संपत राजजी डेढ़िया ने अत्यंत भाव भरे शब्दों में दिवंगता महाश्रमणी रत्नाजी के दिव्यगुणों का उल्लेख करते हुए अपनी ओर से ब्यावर संघ की ओर से गुणानुवाद कर श्रद्धांसुमन समर्पित किये। सभा का संचालन ब्यावर संघ मंत्री श्री मान् कमल जी छल्लानी ने किया। इस अवसर पर उदयपुर, चेन्नई, ब्यावर संघ के गणमान्य श्रावक-श्राविकाएं उपस्थित थे। सभी का मन गमगीन, हृदय उदास था, सभी गुरु चरणों में असीम शांति,समता-सरलता से अभिभूत हो रहे थे।
गुरुदेव ने स्वरचित संधारे के भजन सुनाये।
अंत में सूरत से उपाध्याय प्रवर श्री जितेश मुनि जी म.सा. तथा जम्मू से सुंदर मुनि जी के पत्रों का वाँचन कर चार-चार लोगस का कायोत्सर्ग के साथ महाश्रमणिरत्ना जी को श्रद्धांजलि अर्पित की गई।
अध्यक्ष महामंत्री
संपत राज डेढ़िया कमल छल्लानी