डौंडीलोहारा-- सम्पूर्ण देश के जैन समाज के अनुयायियों के साथ साथ विदेश में रहने वाले जैन धर्मावलंबियों के द्वारा चौबीसवें तीर्थंकर भगवान महावीर स्वामीजी की 2622 जन्मजयंती मनाया जा रहा है। इसी परिप्रेक्ष्य में नगर में भी तीन दिवसीय वृहद जन्मकल्याणक महोत्सव मनाया जा रहा है। वैसे तो डौंडीलोहारा नगरी धर्म नगरी के रूप में सुविख्यात है।यहाँ से अनेको पुण्य आत्माओं ने संसार की असारता को समझते हुए जैन दीक्षा अंगीकार कर स्व व परकल्याण की दिशा में अग्रसर है। भगवान महावीर की वाणी को आत्मसात करते हुए अहिंसा परमोधर्म को चरितार्थ करते हुए नगर के पांच सगी बहनों के साथ साथ कुल 13 लोगों ने जैन दीक्षा अंगीकार किया है जिसमें एक साधु व बारह साध्वी है।व गुरु आज्ञा से ग्रामाणुग्राम विचरण करते हुए अपने आत्मा को कल्याण के मार्ग की ओर अग्रसर किए हुए हैं।वहीं नगर से दीक्षित हुए मुनि व साध्वियों के वर्षावास के लाभ भी नगर को मिल चुके हैं। इस वर्ष के चातुर्मास भी नगर की बेटी मसा सुसारिका श्रीजी का--आचार्य श्री रामलाल जी मसा की आज्ञानुवर्तीनि सुशिष्या शासन दीपिका मंजूला श्रीजी मसा आदि ठाना पांच का सुनिश्चित हुआ है।जिसमें नगर की बेटी सुसारिका श्रीजी मसा भी शामिल हैं।इसके पूर्व सन 2007 में इनका चातुर्मास हो चुका है।डौंडीलोहारा धर्मनगरी ने चातुर्मास सहित बाकी के अन्य आठ मास जिसे साधु भाषा मे शेके काल कहते हैं में भी साधु साध्वियों के आवागमन व विचरण होते है।जिसमें नगर के श्रद्धालु भक्त साधना आराधना तप तपस्या से लाभान्वित होते हैं। साधु प्रमोद मुनिजी मसा है--जैन आचार्य श्रीरामलाल जी मसा के सानिध्य में दीक्षित हुए नगर के एकमात्र संत प्रमोद मुनिजी मसा है।वर्तमान में वे राजस्थान में विचरण कर रहे हैं।संत प्रमोद मुनिजी मसा का चातुर्मास भी नगर में सन 2011 में हो चुका है। वहीं नगर की बेटी सुविराग श्रीजी मसा जैन आचार्य श्रीरामलाल जी मसा के सानिध्य में दीक्षित हुई है व उनका वर्षावास का लाभ नगर के जैन समाज को नही मिला है। नगर की पांच सगी बहनों मे से साध्वी शारदा श्रीजी,दिव्यप्रभा श्रीजी,लक्षिता श्रीजी,यशस्वी श्रीजी व मनस्वी श्रीजी मसा के चातुर्मास भी पुर्व में हो चुके हैं। नगर की ही दो अन्य सगी बहने साध्वी प्रतिष्ठा श्रीजी व रुचिता श्रीजी मसा के चातुर्मास के लाभ भी नगर के जैन समुदाय को प्राप्त हो चुका है।वही नगर की ही एक अन्य बेटी मसा चंद्रकांता श्रीजी का भी चातुर्मास हो चुका है। जिनका ऐतिहासिक दीक्षा महोत्सव नगर ने सन 1971में हुआ था जिसमें नगर में श्रद्धालुओं का जन सैलाब उमड पड़ा था।उनकी दो बहनें अंजना श्रीजी व सुधा श्रीजी मसा भी जिनशासन की सेवा में समर्पित हैं। सन 2001 में जैन मंदिर की प्रतिष्ठा भी हुई है--धर्मनगरी में जैन मंदिर की प्राण प्रतिष्ठा सन 2001 में पूज्य जैन साध्वी निपुनाश्रीजी मसा के सद्प्रेरणा से हुई थी।मंदिर में तीर्थंकर भगवान श्री शांतिनाथ जी,श्री पार्श्वनाथ जी व श्री श्रेयांस नाथ जी की सुंदर प्रतिमा स्थापित है।साथ ही साथ मेरु शिखर के प्रतीक चिन्ह पर विराजमान अष्ट धातु से निर्मित भगवान महावीर स्वामी जी की प्रतिमा भी स्थापित है जहाँ नित प्रतिदिन श्रद्धालुओं के द्वारा स्नात्र पूजा, अभिषेक, शांति कलश व आरती सहित विभिन्न धार्मिक गतिविधि होती है।मन्दिर जी मे ही श्री गौतम स्वामीजी व श्री जिनकुशल सूरी दादा गुरुदेव व अन्य देवी देवताओं की प्रतिमा भी है।वर्षभर विभिन्न धार्मिक आयोजन होते हैं।भगवान जन्मकल्याणक के अवसर पर विशेष अभिषेक पूजन व भगवान जन्म उत्सव मनाया जाता है जिसमे भगवान की माता के देखे स्वप्नों के प्रतीक चिन्हों के साथ हर्षोल्लास से भगवान को पालने में झुलाकर भगवान का जन्मोत्सव मनाया जाता है।कुल मिलाकर डौंडीलोहारा नगरी का धर्म के मामले में एक अलग ही पहचान है।यह नगरी धर्मनगरी के रुप मे भी सुविख्यात है