हैदराबाद - हैदराबाद, कारवान स्थित श्री जिनकुशल दादावाड़ी बाग में चातुर्मासार्थ विराजमान खरतरगच्छाधिपति आचार्य श्री जिनमणिप्रभसूरीश्वरजी म.सा. ने रक्षाबंधन पर्व के अवसर पर अपने मंगल प्रवचन में कहा कि आज श्रावण शुक्ल पूर्णिमा का मंगल प्रभात है। रक्षाबंधन का पर्व नारी और नर के बीच पवित्र संबंध स्थापित करने वाला पर्व है। यह केवल भाई की कलाई पर राखी बाँधने और बदले में उपहार अथवा लिफाफा देने का पर्व नहीं, बल्कि प्रेम, विश्वास, जिम्मेदारी और संस्कारों का पर्व है।
जैन दृष्टि से रक्षाबंधन एक लौकिक पर्व है, लेकिन इसे लोकोत्तर बनाया जा सकता है। आचार्य श्री ने कहा कि आज से ही संवत्सरी महापर्व की तैयारी प्रारंभ करनी चाहिए। जिस प्रकार बहुत मैले कपड़े को धोने से पहले पानी में भिगोया जाता है, उसी प्रकार आत्मा पर जन्म-जन्मांतर से लगे कर्मों के मैल को धोने के लिए आज अपने भीतर प्रेम, पवित्रता और निर्मलता को जागृत करना चाहिए। आज का दिन बाहरी उत्सव के साथ-साथ अपने भीतर को भिगोने का दिन है।
रक्षाबंधन से जुड़ी सनातन परंपरा की लक्ष्मी और राजा बलि की कथा का उल्लेख करते हुए कहा कि लक्ष्मी ने राजा बलि को राखी बाँधकर भाई-बहन का संबंध स्थापित किया और बदले में बलि ने उनकी इच्छा का सम्मान करते हुए भगवान विष्णु को उनके साथ जाने की अनुमति दी। यह प्रसंग बताता है कि राखी केवल एक धागा नहीं, बल्कि वचन, विश्वास और जिम्मेदारी का बंधन है।
जैन परंपरा में मुनि विष्णुकुमार के प्रसंग को भी रक्षाबंधन के संदर्भ में महत्वपूर्ण बताते हुए गुरुदेव श्री ने कहा कि जब नमूचि ने जैन साधु-साध्वियों के विनाश का आदेश दिया, तब मुनि विष्णुकुमार ने अपनी साधना से अधिक जिनशासन और चतुर्विध संघ की रक्षा को प्राथमिकता दी। उन्होंने अपने लिए नहीं, बल्कि धर्म और संघ की रक्षा के लिए कदम उठाया। इसलिए रक्षाबंधन केवल एक बहन की रक्षा का संदेश नहीं देता, बल्कि धर्म, समाज और संस्कारों की रक्षा का भी संकल्प देता है।
इतिहास में कर्णावती द्वारा हुमायूँ को राखी भेजने के प्रसंग का उल्लेख करते हुए कहा कि धर्म अलग होने के बावजूद राखी ने भाई-बहन का संबंध स्थापित किया और हुमायूँ ने उस संबंध की रक्षा को अपना दायित्व माना। उन्होंने कहा कि राखी का मूल्य उसके धागे में नहीं, बल्कि उसके पीछे छिपे भाव में है। आज सोने-चाँदी की राखियाँ आती हैं, उपहार और लिफाफों की अपेक्षाएँ होती हैं, लेकिन रक्षाबंधन रुपयों का नहीं, भावनात्मक संबंधों और विश्वास का पर्व है।
आचार्य श्री ने एक प्रेरणादायी प्रसंग सुनाते हुए कहा कि एक बहन ने भाई को राखी बाँधते हुए उससे वचन लिया—“भैया, कल तुम्हारी शादी होगी, भाभी घर आएगी और परिवार बढ़ेगा। परिस्थितियाँ कैसी भी हों, लेकिन तुम अपने माता-पिता को कभी अलग नहीं करोगे।” वहीं भाई ने भी बहन से वचन लिया—“तुम भी मुझे एक वचन दो कि शादी के बाद कभी अपने पति के कान नहीं भरोगी और उन्हें उनके माता-पिता से अलग होने के लिए नहीं कहोगी।”
गुरुदेव श्री ने कहा कि रक्षाबंधन हमें सिखाता है कि रिश्ते केवल अधिकार से नहीं, बल्कि त्याग, विश्वास और जिम्मेदारी से निभाए जाते हैं। राखी का कच्चा धागा तभी मजबूत बनता है, जब उसके साथ संस्कारों का संकल्प बंधा हो। भाई-बहन का यह पवित्र रिश्ता परिवार को जोड़ने वाला सेतु बने और प्रेम, सम्मान एवं संस्कारों को पीढ़ी-दर-पीढ़ी आगे बढ़ाए—यही रक्षाबंधन की सच्ची सार्थकता है।