रायपुर। परम पूज्य प्रवर्तिनी महोदया श्री निपूणा श्री जी म.सा. की विदुषी शिष्या प्रवचन प्रवीणा प.पू. स्नेहयशा श्री जी म.सा. का भव्याति भव्य चातुर्मासिक मंगल प्रवेश गुरुवार को सुबह 9.45 बजे न्यू राजेंद्र नगर के मेघ-सीता भवन, महावीर स्वामी जिनालय परिसर में हुआ। विवेकानंद नगर के संभवनाथ जिनालय से सुबह 8.45 बजे कलश यात्रा के साथ शाेभायात्रा के साथ साध्वी पद विहार करते हुए महावीर स्वामी जिनालय पहुंची। यात्रा में महिलाएं कलश लेकर चल रही थी। साथ-साथ हाथी, घोड़े और ऊंट की पालकी यात्रा के साथ चलती रहीं। न्यू राजेंद्र नगर पहुंचते ही लोगों ने अपने-अपने घरों के सामने साध्वी स्नेहयशा जी और कलश यात्रा का स्वागत किया। इसके बाद वे जिनालय पहुंचे। यहां वर्धमान बहु मंडल न्यू राजेंद्र नगर और ऋषभ बहु मंडल ने स्वागत गीत प्रस्तुत किया। साध्वी स्नेहयशा ने कहा कि जीवन को सुरक्षित रखने और निर्वाण तक पहुंचने के लिए हमें क्या चाहिए। ऐसा करने के लिए हमें माेह का त्याग करना होगा। उन्होंने उदाहरण देते हुए बताया कि एक व्यक्ति अपना फोन चला रहा था, उसका फोन बहुत ही धीरे-धीरे काम कर रहा था, बीच-बीच में वह काम करना बंद कर देता था। उसने माेबाइल के एक जानकार से अपनी यह समस्या बताई, तो जानकार ने कहा कि आपका मोबाइल अनावश्यक फोटा-वीडियो से भरा हुआ है। उस व्यक्ति ने तुरंत अपने अपने फोन से अनावश्यक फोटो और वीडियो को डिलीट किया, तो फोन धीरे चलने की बजाय दौड़ने लगा। साध्वीजी ने बताया कि कुछ ऐसे ही हमारा जीवन चलता है। हम अपने दिमाग में अनावश्यक और अप्रिय घटनाओं को समटे रखते हैं। इन सबसे हमारा जीवन भी धीरे चलने लगता है। हम आगे की नहीं सोच पाते। वैसे हमें अपने दिमाग से अनावश्यक चीजों को निकालना होगा। चातुर्मास की जिनवाणी सिर्फ श्रवण का कार्य नहीं है। जिनवाणी हमारे जीवन का एक आधार है। सुनना और सुनकर उसे अपने जीवन में उतारना। आपका शरीर कमजोर हो जाए, कोरोना हो जाए तो क्या हुआ बाहर की ऑक्सीजन आप अपने शरीर में ठीक से ग्रहण नहीं कर पा रहे है। आप उसे आचरण में नहीं ले पा रहे तो जीवन की गाड़ी सुचारू रूप से नहीं चल पाएगी। वैसे ही परमात्मा की वाणी को सिर्फ बाहर से सुनना नहीं है। वाणी को आप जितना अपने जीवन में उतारते गए, उतना आप जीते गए। चातुर्मास का मतलब यह है कि इस चार महीने में बाहर के सांसारिक जीवन की गतिविधियां लगभग बंद हो जाती है। जैसा कि बाहर आना-जाना, शादी समरोह, संबंध आदि कार्यक्रम चार महीने बंद हो जाते है और वहीं, धर्म की लाइन ऑन कर दी जाती है। अब इस चार महीने में क्या करेंगे। इन चार महीने अपने करीब रहना है। अपने जितने निकट रहोगे आप परमात्मा महावीर के उतने ही प्रिय बनोगे। साध्वीजी ने बताया कि दो दोस्त एक ही स्कूल में पढ़ते थे। उसमें से एक आगे बढ़ते हुए शहर का नामी शक्सियत बन गया और दूसरा वहीं का वहीं रह गया। अब वहीं फासला हमारे और भगवान महावीर के बीच है। इन चार महीनों में उस फासले को कम करना है। इस फासले को पाटने की ताकत भी प्रभु ने हमें चातुर्मास के रूप में दिया है। इन चार महीनों में हमें तन को भूल जाना है, मन को मांजना है और आत्मा को संवारना है। सांसरिक जीवन में भौतिक सुख आपके मन को संतुष्ट कर सकते है लेकिन आत्मा की तुष्टी और पुष्टि आध्यात्म से होगी। हम सभी कान के कच्चे होते है, एक घटना है, राजा भतरीहरि को सांसरिक जीवन की व्यवस्था को लेकर वैराग्य आया और वे दीक्षित और सन्यासी हो गए। साधना करने के बहुत दिन बाद वे अपने नगर लौटे। वे जब नगर के सीमा के पास पहुंचे तो बहुत थक चुके थे। उन्होंने एक पेड़ के नीचे एक पत्थर काे तकिया बनाया और उस पर सिर रखकर सो गए। इसी समय नगर की कुछ महिलाएं पानी भरने जा रही थी, तो उन्होंने राजा को सोते हुए देखा। यह देखकर उन्होंने कहा कि देखा सन्यासी बनकर भी राजा ने अपने सुख का त्याग नहीं किया, तकिया लगाकर सो रहे है, तो ऐसा साधु बनने से क्या मतलब। राजा हल्की नींद में थे और उन्होंने महिलाअों की बातें सुन ली। राजा ने उस पत्थर को अपने सिर के नीचे हटा दिया। जब महिलाएं पानी भरकर वापस आई तो उन्होंने देखा कि राजा ने पत्थर हटा दिया है। इस पर उन्होंने कहा कि देखा संन्यासी होने के बाद भी राजा ने अपना क्रोध नहीं त्यागा है। साध्वीजी ने कहा इससे आपको क्यी सीख मिलती है। इन दोनों बातों में बहुत बड़ा संदेश है। दुनिया आपको सब तरफ से बोलगी, हर तरीके से बोलेगी कच्चे कान के रहोगे तो आप उस बात को पकड़कर उसी को करने लगोगे और मूल काम से दूर चले जाओगे। चातुर्मास के मुख्य लाभार्थी श्रीमती सराेज देवी धर्मपत्नि स्व. वीरचंद डागा, पुत्र विवेक कुमार डागा, पुत्रवधु श्रीमती दीपिका डागा, पुत्र यश कुमार डागा, पुत्रवधु श्रीमती सोनल डागा, पौत्री कु. जैनीशा, कु. जीविशा, कु. लियासी, पौत्र हर्ष वीर डागा है। साथ ही सह लाभार्थी शिवराज, जय कुमार, विजय कुमार बेगानी, शांतिलाल, दुष्यंत कुमार पींचा हैं।