December 11, 2022


इस बार कौन भारी किसकी बारी, चर्चा-परिचर्चा में पंडरिया विधानसभा।

पंडरिया - इन दिनों पंडरिया विधानसभा क्षेत्र में जाड़े मौसम में भी राजनीतिक गर्मी का पारा चढ़ गया है, विधायक की कुर्सी तो एक है, किंतु बैठने वालों की हमेशा की भांति इस बार भी होड़ लग गई है। क्षेत्रीय लोकप्रिय सहज-सरल सबसे ज्यादा लोगों के बीच चर्चित नाम प्रदेश कांग्रेस कमेटी के महामंत्री पूर्व जनपद पंचायत पंडरिया अध्यक्ष अर्जुन तिवारी के सक्रियता से कुछ दावेदारों में चिंता की लकीर खीचना आरंभ हो गई हैं। पंडरिया विधानसभा में मतदाताओं की जनसंख्या की दृष्टिकोण से चार जातियों की संख्या प्रमुख रूप से हैं, आपस दो चार हजार का अंतर है, उनमे कुर्मी समाज के पांच फिरका है। साहू, आदिवासी, सतनामी इन में आदिवासी व सतनामी जाति को प्रतिनिधित्व करने का अवसर नही मिलता है। जिन दो जाति जिसकी जनसंख्या के आधार पर विधायक की टिकिट प्रमुख दो राष्ट्रीय पार्टी देती हैं। जिन पर जातिवादी होने का आरोप है। जातिवादी राजनीति से बांकी सभी जातिवर्ग के लोग सख्त नाराज है। जब-जब नाराजगी जाहिर होती है, तब तब बड़ी संख्यावाली जाति को चुनाव में बहुत ही कम संख्या वाली वर्ग से हारना पड़ता है। उदाहरण के तौर पर 1984 के बाद हुए चुनाव का परिणाम को रखा जाता है। हारने वालों में बैजनाथ चंद्राकर, मुनीराम साहू, लालजी चंद्रवंशी, मोतीराम चंद्रवंशी का नाम आता है। उसके बाद भी कई चुनावों में स्पष्ट देखने को मिलता है। इस बार कुछ इसी तरह के परिणाम आने की संभावना 2023 के चुनाव में भी ऐसा हुआ तो परिणाम देखने को मिलेगा। जाहिर सी बात है कि लोग चुनाव के समय पार्टी की ऑडियोलॉजी उसके घोषणापत्र अन्य विकल्प को प्राथमिकता के तौर पर सामने रखकर मतदान करता है। किंतु विधायक बनने के बाद से अपनी जाति बिरादरी के लोगों को ज्यादा से ज्यादा महत्व देता है, इस समय पंडरिया विधानसभा में कुछ ऐसी ही स्थिति देखने को मिलता है, और आरोप भी लगाया जाता है। कांग्रेस वर्तमान में सत्तारूढ़ दल है, यहां एक जाति विशेषवर्ग के लोगों की उम्मीदवार ज्यादा दिखाई देती है, अपने अपने तरीके से चुनाव की तैयारी भी कर रहे हैं। हालांकि टिकट वितरण का काम पार्टी को मापदण्ड के आधार पर करना है। पार्टीहित में तैयारी करना भी कोई बुरी बात नही है, कुछ तो अपना समर्थन रिपोर्टकार्ड भी बनवाना आरंभ कर चुके हैं। सरकारी आंकड़ा वर्तमान में बहुत अच्छी संकेत नही होने की बात कही जा रही है। भाजपा में भी कमोवेश कुछ ऐसी ही स्थिति निर्मित है। कुछ तो दूसरे के कंधे पर बंदूक रखकर वार करने में अपना भला समझ रहे हैं। कुछ जाति विशेष के लोग अपनी संख्या भारी होने का दबाव बना टिकट पक्की मान कर चलते हैं। यह भी सही बात है कांग्रेस भाजपा में से एक को विधायक बनना है, तिसरा कोई विकल्प क्षेत्रीय जनता तलाशना नही चाहती है। इसलिए बेचारी पंडरिया विधानसभा की जनता को लादेन मरे की बुश इन्ही के बीच रहना पड़ता है खुश! "फिर क्यों होती है पीड़ा, यही तो है जातिवादी, मानसिकता को बढ़ावा देने की पीढ़ा"? खैर विधानसभा चुनाव होने में एक साल बांकी है। दोनों प्रमुख राष्ट्रीय पार्टी अपने-अपने स्तर पर तैयारी करने में लग गई है। दावेदार भी प्रत्यक्ष अप्रत्यक्षरूप से सामने आने लगे हैं। जनता को अपनी पहचान बताने के बहाने कार्यक्रमो में भिन्न-भिन्न वस्तुओं का वितरण भी करने लगे हैं। बैनर पोस्टर से भी पहचान बनाने लगे हैं। नेताओं का दौरा कार्यक्रम की जानकारी सोशल मीडिया नेटवर्किंग के माध्यम दी जा रही हैं। समाचार पत्रों में भी स्थान दिखता है। कांग्रेस पार्टी के नेता अर्जुन तिवारी के दौरा से क्षेत्रीय विधायक के दावेदारों मेँ जिन लोगों का नाम आ रहा है, उनमें नाराजगी होने के साथ ही माथे पर चिंता की लकीर खिंचनी सुरु हो गई हैं। तिवारी इस क्षेत्र में कांग्रेस पार्टी के साथ ही विरोधियों में भी एक बड़ा चेहरा माना जाता है, जिसकी चर्चा होना भी स्वाभाविक है।

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