कांग्रेस - भाजपा के प्रमुख चेहरों ने बनाई प्रचार से दूरी, बिगड़ सकता है चुनावी समीकरण।
पंडरिया विधानसभा चुनाव पर विशेष टिप्पणी - वरिष्ठ पत्रकार रामकुमार टंडन की रिपोर्ट।
पंडरिया - पंडरिया विधानसभा 71 वैसे काफी चर्चा में रहा है। टिकिट पाने के चाह में दिल्ली दरबार तक गुहार लगाते रहे हैं, किसी ने आक्रोस की जहर चुपचाप पी लिया, तो किसी ने चिल्लाकर रोया, किन्तु आज उन्हे कोप भवन से बाहर निकलने का इजाजत नही है, या फिर उनकी सेवा नही लिया जा रहा है, कारण कुछ भी हो उनका बगावती तेवर होने के अंदेशा मानकर राजनितिक गलियारों में चर्चा का बाजार गर्म है।
कांग्रेस की बात किया जाय तो सबसे पहले विधायिका श्रीमती ममता चंद्राकर प्रचार से दूर हैं। जो जानकारी कांग्रेस पार्टी के तरफ से निकलकर आया है, उससे पता चलता है कि ब्लाक कांग्रेस कमेटी के तरफ से बुलाये गये बैठक में सामिल नही रही हैं। चंद्राकर समाज ने टिकट नही मिलने पर नाराजगी जाहिर किया था। इसका असर भी चुनाव में हो सकता है। विधानसभा से दावेदारी राज्य पिछड़ावर्ग सदस्य महेश चंद्रवंशी ने किया था। वहीं सामान्य वर्ग में प्रमुखता से अर्जुन तिवारी, साहू समाज से विष्णु साहू का नाम आता है। जो पंडरिया विधानसभा के प्रचार से दूर हैं या रखा गया है। ये बात तो पार्टी संगठन और प्रत्याशी के बिच का मामला है। हालांकि अब तक किसी ने भी पार्टी छोड़कर नही गये है जिसे बागी कहा जाय। एक जाति विशेष की संख्या बताकर चुनाव नही जीता जा सकता है, इसका उदाहरण मोहम्मद अकबर खान 2013 के चुनाव में रहे हैं।
भारतीय जनता पार्टी में भी दावेदारों की कमी नही रही है। पूर्व विधायक मोतीराम चंद्रवंशी पंडरिया विधानसभा से विधायक रहे हैं 2018 में हारे हैं। इस बार भी दावेदारी में नाम आता था। चुनाव प्रचार में नजर नही आ रहा है। बिशेसर पटेल की दावेदारी RSS के कोटे से होने का नाम लिया जा रहा था। उनके पास भाजपा के संगठन से हटकर अलग संघीय शक्ति है, वह प्रचार से दूर हैं। युवा चेहरा गोपाल साहू उन दावेदारों में एक था। साहू समाज बीजेपी के कोर वोटर माने जाते हैं, गोपाल की पकड़ समाज में अच्छी खासी मानी जाती है। गोपाल सरपंच, जनपद सदस्य, जिला पंचायत सदस्य भी रहे हैं, छेत्र में उनका व्यापक जनाधार है, उनका उपयोग प्रचार के लिए नही किया जा रहा है। ऐसे कई चेहरा क्षेत्र में भाजपा के बड़े क्षेत्रीय नेताओं में नाम गिना जाता है, घर पर आराम फरमा रहे हैं। संघठन के कुछ नेता बेमन से पार्टी का काम करना है, पार्टी नेतृत्व ने जो फैसला लिया है, शिरोधार मानकर लगे हुए हैं।
भाजपा में चुनावी मैनेजमेंट के लिए आदमी एक्सपोर्ट किया गया इससे भी नाराजगी देखी जा रही है। रायपुर, बेमेतरा, कवर्धा के बाहरी लोगो को पंडरिया की कमान दी गई है, स्थानीय लोगो को उचित सम्मान नहीं दिया जा रहा है।
पिछले चुनाव में तीसरी शक्ति बहुजन समाज पार्टी रही है, इस बार भी मैदान में गोंगपा गठबंधन के साथ उतरा है। बसपा का प्रचार प्रसार ग्रामीण क्षेत्र में अधिक रहता है। स्वर्गीय अजीत जोगी जी पार्टी जानता कांग्रेस छत्तीसगढ़ जे भी भाग्य आजमाने में लगे हुए हैं। चुनावी मैदान में आम आदमी पार्टी प्रत्याशी के साथ ही स्वतंत्र उम्मीदवार भी भाग लिए है।
मुख्य मुकाबला कांग्रेस पार्टी के नीलकंठ चंद्रवंशी के साथ भाजपा प्रत्याशी श्रीमती भावना बोहरा के साथ ही दिखता है। दोनो पार्टी संगठन में प्रमुख दावेदार रहे चेहरा प्रचार से दूर हैं, इसकी चर्चा है वहीं चुनावी मैनेजमेंट पर बाहरी लोगों की दखल से भी खासी नाराजगी देखी जा रही है जो सारा चुनावी समीकरण को बिगाड़ सकता है ।